बौध्द विहारो मे आम्मेडकरी बौध्द आनुयाईयो द्वारा र्अषाढ पुर्णिमा अर्थात गुरू गुरुपूर्णिमा से तीन महीने का वर्षावास
बौध्द विहारो मे आम्मेडकरी बौध्द आनुयाईयो द्वारा तीन महीने का वर्षावास प्रारम्भ।
की शुरूआत बौध्द अनुआईयी उपासको ्द्वारा रबौध्द विहारो मे अषाढ पुर्णीमा अर्थात गुरु पूर्णिमा से तीन महीने का वर्षावास प्रारम्भ किया है। इस समय बौद्ध विहारो मे बौध्द उपासक अनुयायी एकत्रित होकर बुध्द धर्म और उसका ग्रंथ का पठन किया जाने की शुरुआत होती है। उपस्थित भंते भीछु द्वारा धम्म प्रवचन किया जाता है। गुरु पूर्णिमा सम्मान और कृज्ञता का प्रतीक है। गुरु सही गलत के भेद के अंतर समझाता है अज्ञानता के अंधकार को दुर ज्ञान के प्रकाश जलाता है। गुरु वह दिपक है जो हमारे जीवन के अंधकार को दुर करता है।बौद्ध धर्म वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। मिथ्यावाद और पाखंड और अंधविश्वास इसमें नही है।संसार मे दुख है तो दुख का कारण भी है। औरजिसका निवारण भी और मार्ग भी है जीवन में ।दुख का मुख्य आधार इच्छा जिससे ही दुख उत्पन्न है। बुढापा बिमारी मृत्यु, जीवन मे अच्छा बनने लिए जीवन आदर्श के लिए मापदंड होना चाहिए, आदर्श के कमसेकम पांच मापदंड (नियम )होने चाहिए जिसमे पहला है किसी को नुकसान आहात नपहुचना हत्या जैसे कार्य न करना झूठ न बोलना, चोरी न करना, किसी स्री महिला के सेबुरी नियत से छेडछाड न नियत न रखना, मास मदिरा नशेली वस्तुओ का सेवन नकरना से दुर रहना चाहिए पांच शीलो स्वीकार करना आवश्यक होना चाहिए।, मन ही दुःखो का प्रमुख कारण प्रधान है। मन नियंत्रित होना चाहिए निर्मल साफ सुथरा होना चाहिए।व्यक्ति की इच्छाएं लगाव लालचतृष्णा उत्पन्न करती है। संतोष से बढा धन नही है.। हमे लालच मे वशीभूत नही होना चाहिए। हमे दयावान करुणामई होना चाहिए। मातृभाव मीठापन सही वाणी व्यवहार करना चाहिए, सही दृष्टि होनी चाहिए। सही संकल्प सही प्रयास सही स्मृति सही कर्म सही दृष्टि होनी चाहिए। दुख को दूर करने लिए अष्टागिक मार्ग को अपनाना चाहिए : भगवान बुद्ध द्वारा सारनाथ के मृगदाव (हिरण पार्क) में दिए गए प्रथम उपदेश की इस ऐतिहासिक घटना और दिन को बौद्ध धर्म में ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ (Dhammacakkappavattana) कहा जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह दिन आषाढ़ पूर्णिमा (Ashadha Purnima) का होता है जो अंग्रेजी कैलेंडर में अमूमन जुलाई के महीने में आता है।इस बेहद पवित्र दिन और महीने को अलग-अलग परंपराओं में कई नामों से जाना जाता है:1. धम्मचक्कप्पवत्तना दिवस (Dhammachakra Pravartana Divas)महत्व: इसी दिन तथागत बुद्ध ने अपने पांच तपस्वी साथियों (पंचवर्गीय भिक्षुओं) को पहला उपदेश देकर ‘धर्म के पहिये’ को गतिमान किया था। इसे “धम्मा डे” (Dharma Day) भी कहा जाता है।2. आषाढ़ पूर्णिमा / गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima)महत्व: बौद्ध परंपरा में इसे गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि प्रथम उपदेश के साथ ही बुद्ध ने गुरु के रूप में शिक्षा देना शुरू किया और प्रथम बौद्ध भिक्षु संघ (Sangha) की स्थापना हुई थी।
