गुजरात राज्य साबरकाठा जिले के पारूपाल गांव मे सवर्ण दबंगो का अनुसूचित जाति के लोगों के साथ जातिगत भेदभाव और अत्याचार 35अनुसूचित जाति परिवार के लोग गांव छोडने को मजबुर?
गुजरात राज्य साबरकाठा जिले के पारूपाल गांव मे सवर्ण दबंगो का अनुसूचित जाति के लोगों के साथ जातिगत भेदभाव और अत्याचार 35अनुसूचित जाति परिवार के लोग गांव छोडने को मजबुर?
प्राप्त जानकारी के अनुसार गुजरात राज्य के साबरकाठा जिले के रुपाल गांव मे अनुसूचित जाति परिवार लोगो के साथ जातिगत भेदभाव न हो निवारण के अनुसूचित जनजाति निवारण मे कानुन बना हुआ है, कडी कार्यवाही होती है। साथ हीअनुसूचितदलित वंचित पिछडो को आरक्षण दिया है।विकास के लिए सरकारी कार्यो विभागो मेऔर राजनीती मे आरक्षण सामाजिक अधिकार दिये गए है ब सम्मानितौर समान के साथ जीवन जीने का अधिकार दिया गया है।आरलेकिनक्षण से अनुसूचित जाति जन जाति के सरकारी नौकरी मे परमोशन ले रहे उच्च शिक्षा पप्मेराप्त कर हे हैकलेक्टर एस पी बन रहे, राजनीति प्रतिनिधित्व मंत्री मूख्यमंत्री राज्यपाल राष्ट्रपति बन रहे और मनुवादी स्वर्णो के पेट मेद र्द होता है। वहीं जातिगत सामाजिक भेदभाव अत्याचार देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज्य गुजरात मे दुर्भाग्य पुर्भाग्यपुर्ण है।गुजरात के साबरकांठा जिले के रूपाल गांव में लगभग 35 दलित परिवारों को दबंग सवर्णों के हाथों गंभीर जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। परेशान होकर, इन परिवारों ने हिम्मतनगर स्थित जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है और न्याय न मिलने पर सामूहिक पलायन (गांव छोड़ने) की चेतावनी दी है।घटना के मुख्य बिंदु:दैनिक जीवन पर प्रतिबंध: दलितों पर मूंछें रखने, अच्छे कपड़े पहनने, मोटरसाइकिल चलाने और धूप का चश्मा पहनने जैसी पाबंदियां लगाई जा रही हैं।धार्मिक और सामाजिक बहिष्कार: दलित दूल्हों को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया जाता और उन्हें सार्वजनिक आयोजनों या मंदिरों में अलग बैठाया जाता है। गांव की दुकानों से उन्हें दैनिक सामान तक नहीं खरीदने दिया जा रहा है।प्रशासनिक निष्क्रियता: दलित समुदाय का आरोप है कि उन्होंने एट्रोसिटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत कई शिकायतें दर्ज कराई हैं, लेकिन पुलिस या स्थानीय प्रशासन द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।संवैधानिक और कानूनी अधिकार:भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 छुआछूत (अस्पृश्यता) को पूरी तरह से गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध बनाता है। ऐसे मामलों से निपटने के लिए हमारे देश में ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ यानी एट्रोसिटी एक्ट लागू है।आप कैसे मदद कर सकते हैं?अगर आप इस विषय में आवाज उठाना
