सावधान – आगे गढ्ढा है….? कहानी जियो दुसरो के लिए… लेखक निर्मलदास मानकर
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“जिओ दूसरों के लिए”
कहानी
लेखक — निर्मल दास मानकर
सुबह से ही आसमान का मिजाज कुछ बदला-बदला था। बादलों की हल्की परतें सूरज को बार-बार अपने पीछे छिपा रही थीं। हवा में उमस थी और शहर की सड़कों पर रोज की तरह भागती जिंदगी अपनी रफ्तार में थी।
सुरेंद्र अपने स्कूल की कक्षा में खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था। वह आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था। पढ़ाई में सामान्य, लेकिन व्यवहार में असाधारण। उसके शिक्षक अक्सर कहते थे कि सुरेंद्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी किताबों से ज्यादा उसके भीतर की संवेदना है।
उस दिन हिंदी की कक्षा में मालवीय सर ने बच्चों से पूछा—
“बच्चो, बताओ, मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य क्या होना चाहिए?”
किसी ने कहा—“बहुत पैसा कमाना।”
किसी ने कहा—“बड़ा अधिकारी बनना।”
एक छात्र ने कहा—“मशहूर होना।”
मालवीय सर मुस्कुराए।
“और सुरेंद्र, तुम क्या सोचते हो?”
सुरेंद्र कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला—
“सर, मेरे हिसाब से जिंदगी सिर्फ अपने लिए जीने का नाम नहीं है। अगर हम किसी दूसरे के काम आ सकें, तो शायद वही जिंदगी की सबसे बड़ी सफलता है।”
कक्षा में कुछ बच्चे हँस पड़े।
मालवीय सर ने उसे ध्यान से देखा।
“तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”
सुरेंद्र ने धीरे से कहा—
“मेरे पिताजी कहते हैं कि बेटा, भगवान ने हमें दो हाथ इसलिए दिए हैं कि एक हाथ से अपना काम करें और दूसरे से किसी जरूरतमंद का हाथ थाम सकें।”
कक्षा में अचानक शांति छा गई।
मालवीय सर के चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी।
“बहुत अच्छा सुरेंद्र। इसे लिखकर रखो। एक दिन यही विचार तुम्हारी पहचान बनेगा।”
सुरेंद्र ने अपनी कॉपी में लिख दिया—
“जिओ दूसरों के लिए।”
उसे क्या पता था कि कुछ ही समय बाद यही चार शब्द उसके जीवन की दिशा बदल देंगे।
—
बारिश का वह दिन
कुछ सप्ताह बाद स्कूल की वार्षिक पत्रिका के लिए विद्यार्थियों से कहानी, कविता और लेख आमंत्रित किए गए।
मालवीय सर ने सुरेंद्र से कहा—
“तुम भी कुछ लिखो।”
सुरेंद्र ने पूछा—
“सर, क्या लिखूँ?”
“जो तुम महसूस करते हो, वही लिखो।”
सुरेंद्र ने कई दिनों तक सोचा। उसने एक कागज पर शीर्षक लिखा—
- “जिओ दूसरों के लिए।”
