अपराध की सजा अपर अपराधी के साथ निर्दोष भी भोगता है?
मुस्कान और साहिल की मृत्युंदंड सजा की काल्पनिक सामाजिक कहानी
” फाँसी की सज़ा के बाद ! ”
😒
(एक मार्मिक सामाजिक काल्पनिक कहानी)
लेखक: निर्मल दास मानकर
(मोबाइल 7354089988)
जेल की ऊँची-ऊँची दीवारों के पीछे भी जिंदगी चलती है। वहाँ सुबह होती है, शाम ढलती है, त्योहार आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन उन दीवारों के भीतर रहने वाले लोगों के लिए हर दिन का अर्थ बाहर की दुनिया से अलग होता है। किसी के लिए जेल अपने किए की सजा होती है, तो किसी के लिए वह अपनों से बिछड़ने का अंतहीन इंतजार।
मेरठ की जिला जेल में नवरात्र का समय था। जेल के प्रांगण में रोज की तरह हलचल थी, लेकिन इस बार वातावरण में एक अजीब-सी उदासी घुली हुई थी। महिला बैरक के एक कोने में बैठी मुस्कान की आँखें दरवाजे पर टिकी थीं। उसकी गोद में दस महीने की नन्ही बेटी थी, जो कभी उसकी साड़ी का पल्लू पकड़ती, कभी अपनी मासूम आँखों से माँ का चेहरा निहारती।
मुस्कान के चेहरे पर अब पहले जैसी मुस्कान नहीं थी।
वह मुस्कान, जिसके नाम में कभी खुशी का एहसास था, आज अपने ही नाम से जैसे अनजान हो गई थी।
एक अपराध और एक सजा
सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत ने मुस्कान और साहिल को मृत्युदंड सुनाया था। अदालत का फैसला आने के बाद उनकी जिंदगी का रास्ता बदल चुका था। कानून ने अपराध के लिए सजा निर्धारित कर दी थी, लेकिन उस फैसले के बाद पैदा हुए सवालों का उत्तर किसी के पास नहीं था।
क्या सजा केवल अपराधी को मिलती है?
या कभी-कभी उसका बोझ उन मासूमों को भी उठाना पड़ता है, जिन्होंने कोई अपराध किया ही नहीं?
मुस्कान की दस महीने की बेटी उन सवालों का सबसे जीवंत उत्तर थी। उसे न अदालत का अर्थ मालूम था, न अपराध का। वह तो केवल अपनी माँ की गोद पहचानती थी। उसके लिए माँ ही संसार थी, माँ की आवाज ही संगीत थी और माँ का स्पर्श ही सुरक्षा।
लेकिन समय के पास अपनी गति थी।
जेल की दीवारें किसी की भावनाओं से नहीं पिघलतीं। वहाँ नियम होते हैं, समय-सारिणी होती है और हर व्यक्ति के लिए निर्धारित सीमाएँ होती हैं।
मुस्कान के जीवन में भी अब हर चीज नियमों से बँधी थी।
नवरात्र की आहट
शारदीय नवरात्र आरंभ हुए तो जेल में धार्मिक गतिविधियों की तैयारियाँ होने लगीं। महिला बंदियों और कैदियों को नियमानुसार व्रत रखने के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जा रही थी। जेल प्रशासन ने सुरक्षा और अनुशासन का ध्यान रखते हुए पूजा-पाठ की व्यवस्था की।
महिला बैरक में कई बंदियों ने व्रत रखा। किसी ने माँ दुर्गा से अपने परिवार की कुशलता माँगी, किसी ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए प्रार्थना की, तो किसी ने अपने जीवन की गलतियों के लिए क्षमा की कामना की।
मुस्कान भी कभी नवरात्र में पूजा-पाठ किया करती थी। उसे याद आया कि घर में त्योहारों के दिनों में किस तरह सुबह-सुबह पूजा की तैयारी होती थी। माँ दुर्गा के गीत सुनाई देते थे, घर में प्रसाद बनता था और परिवार के लोग एक साथ बैठते थे।
उसने अपनी बेटी को देखा।
बेटी की आँखों में नींद थी। वह माँ की गोद में सिर रखकर सोने की कोशिश कर रही थी।
मुस्कान के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उठी।
उसने मन ही मन सोचा, “मेरी बच्ची जब बड़ी होगी, तब उसे मेरे बारे में क्या बताया जाएगा? क्या वह मुझे केवल एक अपराधी की माँ के रूप में याद करेगी? क्या उसे कभी मेरी गोद की गर्माहट याद रह पाएगी?”
इन सवालों का उसके पास कोई उत्तर नहीं था।
इस बार नहीं रखा व्रत
पिछले नवरात्र में मुस्कान ने धार्मिक गतिविधियों में भाग लिया था। लेकिन इस बार उसने व्रत नहीं रखा। उसने पहले की तरह पूजा-पाठ भी नहीं किया।
उसके मन में क्या चल रहा था, यह केवल वही जानती थी।
शायद अपराधबोध था, शायद भविष्य का भय, शायद अपनी बेटी को लेकर चिंता और शायद जीवन में घट चुकी घटनाओं से उपजा ऐसा मानसिक संघर्ष, जिसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं था।
उसकी सहबंदी बसन्ती ने एक दिन पूछा, “मुस्कान, इस बार व्रत क्यों नहीं रख रही हो? तुम्हें तो पिछले साल पूजा करते देखा था।”
मुस्कान कुछ देर चुप रही।
फिर धीमी आवाज में बोली, “बसन्ती दीदी, व्रत रखने से मन को शांति मिलती है, ऐसा मैंने सुना है। लेकिन मेरा मन तो कहीं टिकता ही नहीं। आँखें बंद करती हूँ तो अतीत सामने आ जाता है। बेटी को देखती हूँ तो भविष्य डराने लगता है।”
बसन्ती ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“मनुष्य का जीवन केवल उसके बीते हुए कल से नहीं बनता, मुस्कान। आज भी हमारे सामने होता है। हम जो कर चुके हैं, उसे बदल नहीं सकते, लेकिन अपने भीतर क्या बचाकर रखना है, यह सोच सकते हैं।”
मुस्कान ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
कमला के पास भी अपनी पीड़ा की लंबी कहानी थी। जेल में रहने वाली हर महिला के पास एक अलग अतीत था। किसी ने आवेश में गलती की थी, कोई परिस्थितियों से टूट गई थी और कोई अपने अपराध की गंभीरता से अब तक जूझ रही थी। लेकिन उन सबके बीच एक बात समान थी—हर किसी के भीतर कहीं न कहीं एक इंसान जीवित था।
माँ दुर्गा और एक माँ का मन
नवरात्र के दौरान एक दिन जेल में कन्या पूजन की व्यवस्था की गई। महिला बंदियों के बच्चों और अन्य बच्चियों को भोजन कराया गया। जेल प्रशासन ने नियमों के अनुसार यह कार्यक्रम आयोजित किया।
छोटी-छोटी बच्चियाँ पंक्ति में बैठी थीं। किसी के माथे पर रोली का तिलक था, किसी के पैरों में आलता लगा था। वे हँस रही थीं, आपस में बातें कर रही थीं और भोजन के बाद प्रसाद पाने की प्रतीक्षा कर रही थीं।
मुस्कान की बेटी भी उन बच्चियों के बीच थी।
वह अभी इतनी छोटी थी कि उसे यह समझ नहीं आता था कि वह किसी धार्मिक आयोजन में शामिल है। उसके लिए यह बस कुछ लोगों के बीच बैठने, नए चेहरे देखने और कभी-कभी खिलखिलाने का अवसर था।
मुस्कान दूर खड़ी उसे देख रही थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसे लगा, जिन बच्चियों को लोग देवी का स्वरूप मानकर पूज रहे हैं, उनमें उसकी अपनी बेटी भी तो शामिल है। यह बच्ची भी उतनी ही पवित्र, उतनी ही निष्पाप और उतनी ही अधिकारपूर्ण है, जितनी दुनिया की कोई दूसरी बच्ची।
फिर उसके मन में एक प्रश्न उठा—अगर बच्चों का कोई अपराध नहीं, तो उन्हें बड़ों के अपराध की छाया क्यों झेलनी पड़े?
वह जानती थी कि अदालत के फैसले पर टिप्पणी करने का यह अवसर नहीं था। अपराध की गंभीरता अपनी जगह थी और कानून का निर्णय अपनी जगह। लेकिन एक माँ का मन कानून की भाषा नहीं समझता। वह केवल अपने बच्चे का भविष्य देखता है।
बेटी ने दूर से माँ को देखा और अपने छोटे-छोटे हाथ उसकी ओर बढ़ा दिए।
मुस्कान उसके पास पहुँची। बच्ची ने उसकी उँगली पकड़ ली।
उस क्षण मुस्कान को लगा, जैसे समय ठहर गया हो।
उसने बच्ची के माथे को चूमा।
“तुम्हारा जीवन मेरी गलतियों से बड़ा होना चाहिए,” उसने मन ही मन कहा।
त्योहार की थाली और जेल का अनुशासन
जेल प्रशासन ने व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई थी। सुरक्षा और अनुशासन के नियमों के बीच धार्मिक परंपराओं का पालन कराया जा रहा था।
वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा ने व्यवस्था के संबंध में बताया कि व्रत रखने वाली महिला बंदियों और कैदियों को नियमानुसार आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई गई। कन्या पूजन भी विधिवत कराया गया और बच्चियों को भोजन कराया गया।
जेल के कर्मचारियों के लिए यह एक नियमित प्रशासनिक दायित्व था, लेकिन उन महिलाओं के लिए इन छोटे-छोटे आयोजनों का भावनात्मक महत्व भी था।
त्योहार उन्हें बाहर की दुनिया की याद दिलाते थे।
किसी को अपने घर का आँगन याद आता, किसी को माँ के हाथ का भोजन, किसी को बच्चों की हँसी और किसी को वह समय, जब जीवन इतना उलझा हुआ नहीं था।
मुस्कान के लिए भी नवरात्र केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह गए थे। वे उसके भीतर उठते सवालों का आईना बन गए थे।
उसने व्रत नहीं रखा था, लेकिन वह दूसरी महिलाओं को पूजा करते देखती रही।
शायद उसके मन में आस्था पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। शायद वह स्वयं नहीं समझ पा रही थी कि उसे ईश्वर से शिकायत है, अपने आप से या उन परिस्थितियों से, जिनके बीच उसका जीवन इस मोड़ तक पहुँचा था।
साहिल और अधूरा भविष्य
जेल की दीवारों के भीतर मुस्कान और साहिल के भविष्य को लेकर चर्चाएँ होती थीं। अदालत के मृत्युदंड के फैसले ने दोनों के जीवन को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया था, जहाँ आगे का रास्ता कानूनी प्रक्रिया से तय होना था।
लेकिन मुस्कान की बेटी का भविष्य किसी कानूनी दस्तावेज में पूरी तरह दर्ज नहीं हो सकता था।
उसकी परवरिश कौन करेगा? वह किसे माँ कहकर पुकारेगी? क्या उसे अपनी माँ की याद रहेगी? क्या वह कभी समझ पाएगी कि जिस स्त्री की गोद में वह सोती थी, उसका जीवन इतनी कठिन परिस्थितियों में क्यों घिर गया?
ये प्रश्न जेल के किसी रजिस्टर में नहीं लिखे थे।
वे केवल एक माँ के हृदय में लिखे थे।
कभी-कभी मुस्कान बेटी को सोते हुए देखती और देर तक उसका चेहरा निहारती रहती। बच्ची नींद में मुस्कराती तो मुस्कान की आँखें भर आतीं।
वह सोचती, “काश, मैं इसे एक ऐसा संसार दे पाती, जहाँ इसे अपने जन्म की कहानी बताते हुए किसी को सिर झुकाना न पड़े। काश, यह अपनी पहचान अपने कर्मों से बनाए, मेरे अतीत से नहीं।”
पर जीवन में काश कह देने से बीती हुई घटनाएँ वापस नहीं लौटतीं।
असली प्रश्न
नवरात्र समाप्त होने लगे। जेल की दिनचर्या फिर सामान्य होने लगी। पूजा की सामग्री समेट दी गई। महिला बैरक में फिर वही आवाजें, वही गिनती और वही निर्धारित समय पर होने वाले काम शुरू हो गए।
लेकिन मुस्कान के भीतर कुछ प्रश्न अब भी जीवित थे।
वह जानती थी कि किसी गंभीर अपराध के बाद न्याय की माँग स्वाभाविक है। पीड़ित परिवार का दर्द भी वास्तविक है और उस दर्द को अनदेखा नहीं किया जा सकता। न्याय केवल अपराध करने वाले व्यक्ति के लिए सहानुभूति का नाम नहीं है; उसमें पीड़ित की पीड़ा, समाज की सुरक्षा और कानून की जवाबदेही भी शामिल है।
फिर भी, समाज का दायित्व यहीं समाप्त नहीं हो जाता।
अपराध करने वाले व्यक्ति के बच्चे को उसके माता-पिता के अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उसे शिक्षा, सुरक्षा, स्नेह और सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए।
मुस्कान की कहानी केवल एक अपराध और एक सजा की कहानी नहीं थी। यह उस बच्ची की कहानी भी थी, जिसका जन्म ऐसे अतीत की छाया में हुआ था, जिसे उसने चुना ही नहीं था।
यह उन महिलाओं की कहानी भी थी, जो जेल में रहते हुए अपने जीवन की गलतियों, पछतावे और भविष्य की अनिश्चितताओं से जूझती हैं।
और यह समाज के सामने खड़ा एक कठिन प्रश्न भी था—क्या हम न्याय की माँग करते समय उन निर्दोष बच्चों को भी याद रखते हैं, जिनका जीवन बड़ों के फैसलों से प्रभावित हो जाता है?
अंत में एक छोटी-सी उम्मीद
एक शाम मुस्कान अपनी बेटी को गोद में लेकर बैरक के भीतर बैठी थी। बाहर आसमान पर सूरज की अंतिम किरणें धीरे-धीरे धुँधली हो रही थीं।
बेटी ने माँ के चेहरे को छुआ और फिर खिलखिलाकर हँस दी।
कई दिनों बाद मुस्कान के होंठों पर भी हल्की-सी मुस्कान आई।
वह मुस्कान खुशी की नहीं थी। उसमें दर्द था, पछतावा था, अनिश्चितता थी और एक माँ की ममता भी थी।
उसने बेटी को सीने से लगा लिया।
जेल की दीवारें अब भी अपनी जगह खड़ी थीं। कानून अपनी प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ रहा था। अतीत अपनी जगह अपरिवर्तित था।
लेकिन उस छोटी बच्ची के सामने अभी पूरा जीवन पड़ा था।
मुस्कान की आँखों से एक आँसू गिरा। उसने उसे पोंछा और बच्ची के माथे को चूम लिया।
उस क्षण शायद वह केवल इतना चाहती थी कि उसकी बेटी को एक दिन ऐसा जीवन मिले, जिसमें उसे अपनी माँ के अतीत का बोझ नहीं, बल्कि अपने भविष्य की स्वतंत्रता महसूस हो।
क्योंकि अपराध की सजा कानून तय करता है, लेकिन किसी निर्दोष बच्चे के भविष्य की रक्षा करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
🙏
समाप्त।
