भीमपुर ब्लॉक के ग्राम में हुए शादी समारोह में दिखी मालू के पत्तों की झलक

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भीमपुर ब्लॉक के ग्राम में हुए शादी समारोह में दिखी मालू के पत्तों की झलक

पारंपरिक पत्तलों की ओर लौटती थाली: आधुनिक बफे सिस्टम के बीच मालू के पत्तों की संस्कृति को नया जीवन

बैतूल। जहां एक ओर देश भर में पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में परंपरागत खानपान की संस्कृति आज भी जीवंत है। बैतूल जिले के भीमपुर ब्लॉक के एक गांव में हाल ही में संपन्न एक शादी समारोह इसका जीवंत उदाहरण बना। विवाह में बफे स्टाइल से भोजन परोसा गया, लेकिन खास बात यह रही कि लगभग 50 प्रतिशत लोग अपने भोजन को लेकर नीचे ज़मीन पर बैठकर परंपरागत शैली में भोजन करते नजर आए।
होम्योपैथिक विशेषज्ञ डॉ मनोज वरवड़े ने बताया कि यह दृश्य यह दर्शाने के लिए पर्याप्त था कि ग्रामीण समाज अब भी अपनी पुरातन परंपराओं और स्वास्थ्यवर्धक जीवनशैली से पूरी तरह दूर नहीं हुआ है। आज जब एल्यूमिनियम फॉयल, थर्माकॉल और प्लास्टिक के दोने-पत्तलों ने शादी-ब्याह की थालियों को घेर लिया है, वहीं मालू (लता काचनार) जैसे पौधों के पत्तों की बनी पत्तलों की उपयोगिता और प्रासंगिकता एक बार फिर चर्चा में है।

 —क्या है मालू का महत्व—

 डॉ. वरवड़े ने बताया कि उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, सिक्किम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के जंगलों में भरपूर मात्रा में पाया जाने वाला मालू एक बहुउपयोगी पौधा है। इसके बड़े, मजबूत पत्तों से बनी पत्तलें न केवल पर्यावरण-अनुकूल हैं बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी मानी जाती हैं।  

—भोजन और पौराणिक महत्व—

मालू के पत्तों से बनी पत्तलें शादी-ब्याह, धार्मिक आयोजनों और सामुदायिक भोजों में पारंपरिक रूप से उपयोग की जाती रही हैं। वेद-पुराणों में इन पत्तों को शुद्ध और शुभ बताया गया है। आदिवासी समुदायों की संस्कृति में इनका प्रयोग केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है। मालू के पत्तों, फूलों और छाल में खांसी-जुकाम, पाचन तंत्र के विकार, त्वचा संबंधी रोगों और सूजन में राहत देने वाले प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं। आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में इसका उपयोग लंबे समय से होता आया है। मालू के पत्ते पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल होते हैं। इनसे बनी पत्तलें थर्माकॉल और प्लास्टिक का बेहतरीन विकल्प हैं। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण महिलाओं के लिए यह एक आय का स्रोत बन सकता है। पत्तल निर्माण एक लघु उद्योग का रूप ले सकता है, जो पलायन को रोकने में भी मददगार हो सकता है। जर्मनी सहित कई पश्चिमी देशों में ऐसे प्राकृतिक पत्तों से बनी प्लेटों को “नेचुरल लीफ प्लेट्स” कहा जाता है और वे वहां पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में खूब प्रचलित हैं। यह भारत की पारंपरिक संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता को भी दर्शाता है।

—लौट रही है थाली की गरिमा—

भीमपुर की एक शादी में जब लोग अपनी थाली लेकर नीचे बैठकर भोजन कर रहे थे, तो यह किसी सांस्कृतिक क्रांति से कम नहीं लगा। यह संदेश स्पष्ट था  “परंपरा मरी नहीं है, बस थोड़ी देर के लिए ओझल हुई थी।”अब जरूरत है कि सरकार, सामाजिक संगठनों और स्थानीय समुदाय मिलकर मालू जैसे पौधों के उपयोग को प्रोत्साहित करें। यदि यह प्रयास ठोस रूप ले, तो एक बार फिर हमारी थाली में न केवल स्वाद और स्वास्थ्य लौटेगा, बल्कि पर्यावरण को भी राहत मिलेगी।
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