न्याय की जीत-बैतूल चेक बाउंस केस मे रंजीत राठौर को मिली बरी दस्तावेज ने साबित की सच्चाई

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न्याय की जीत – बैतूल में चेक बाउंस केस में आरोपी रंजीत राठौर को मिली पूरी बरी, दस्तावेजों ने साबित की सच्चाई!

बैतूल, मध्य प्रदेश – न्याय व्यवस्था में दस्तावेजी सबूतों की ताकत और सच्चाई के साथ खड़े होने की मिसाल पेश करते हुए मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी (सीजेएम) बैतूल, श्रीमती संगीता भारती राठौर ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चेक बाउंस के एक मामले में आरोपी रंजीत राठौर को धारा 138, परक्राम्य विनिमय अधिनियम 1881 के तहत लगे आरोप से पूरी तरह दोषमुक्त करार दिया गया है। यह फैसला न केवल आरोपी के लिए राहत की सांस लेकर आया, बल्कि यह दिखाता है कि कानून केवल आरोपों पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर टिका होता है।

**क्या था पूरा मामला?**
परिवादी शेख सज्जू (पिता शेख सकील, आजाद वार्ड, कोठी बाजार, बैतूल) और आरोपी रंजीत राठौर (चन्द्रशेखर वार्ड, बैतूल) एक पार्टनरशिप व्यवसाय में साथ काम करते थे। व्यवसाय में अरुण पवार को कुल 6 लाख रुपये देने थे, जिसमें आरोपी रंजीत राठौर का हिस्सा 3 लाख 50 हजार रुपये था। परिवादी ने खुद अपना और आरोपी का हिस्सा मिलाकर यह राशि अदा कर दी। बदले में आरोपी ने HDFC बैंक का चेक क्रमांक 000005, दिनांक 15.05.2019 जारी किया, जो अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हो गया। परिवादी ने मांग नोटिस भेजा, लेकिन जवाब नहीं मिला और राशि नहीं चुकाई गई, जिसके बाद उन्होंने धारा 138 के तहत परिवाद दायर किया (प्रकरण क्रमांक 425/2025)।

**बचाव पक्ष की मजबूत रणनीति**
आरोपी की ओर से बैतूल के जिला न्यायालय के अनुभवी अधिवक्ता **भारत सेन** ने पैरवी की। उन्होंने दस्तावेजी सबूत पेश कर दिखाया कि परिवादी ने वैध ऋण या दायित्व का अस्तित्व संदेह से परे साबित नहीं किया। चेक पर हस्ताक्षर होने के बावजूद, परिवादी ने चेक के अलावा कोई अन्य दस्तावेज – जैसे लेन-देन का रिकॉर्ड, एग्रीमेंट या बैंक स्टेटमेंट – नहीं पेश किया। अधिवक्ता भारत सेन ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों (जैसे रंगप्पा बनाम श्री मोहन, बिर सिंह बनाम मुकेश कुमार आदि) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि धारा 118 और 139 की उपधारणाएं (presumptions) परिवादी के पक्ष में शुरूआती होती हैं, लेकिन इन्हें आरोपी दस्तावेजी साक्ष्य से खंडन (rebut) कर सकता है।

**न्यायालय का फैसला और संदेश**
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने पाया कि परिवादी परिवाद को प्रमाणित करने में असफल रहा। केवल चेक धारक होना ही ऋण का प्रमाण नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि उपधारणाओं का गलत लाभ नहीं उठाया जा सकता और दोषसिद्धि के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं। आरोपी ने दस्तावेजों के माध्यम से अपना बचाव सफलतापूर्वक किया, जिससे उपधारणाएं खारिज हो गईं।

यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए प्रेरणा है जो चेक बाउंस के झूठे या कमजोर मामलों में फंस जाते हैं। यह साबित करता है कि अगर आपके पास सच्चाई और मजबूत दस्तावेज हैं, तो न्याय मिलेगा – चाहे कितना भी समय लगे। अधिवक्ता भारत सेन की कुशल पैरवी और आरोपी की दृढ़ता ने दिखाया कि कानून कमजोरों का साथ देता है, जब वे सच के साथ खड़े होते हैं।

**न्याय की यह जीत** हमें याद दिलाती है: **सच की ताकत से बड़ा कोई हथियार नहीं!**
जय हिंद! जय न्याय!

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