सतपुडा की छावसे आसमान तक की उडान
सतपुड़ा की छांव से आसमान की उड़ान: संघर्ष, साहस और सफलता की एक संपूर्ण गाथा
लेखक:निर्मलदास मानकर मो. न. 73540899988 Email
Nirmalda3@gmail.com
मध्य प्रदेश के विस्तृत और घने जंगलों से घिरे सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के आंचल में बसे ‘धमना’ गाँव में प्रकृति की सुंदरता के साथ-साथ गरीबी का घना अंधेरा भी था। गाँव के ज़्यादातर लोग आदिवासी समुदाय से थे, जो मजदूरी या जंगलों से लकड़ी बीनकर गुजारा करते थे। ऐसे में बच्चों के लिए पढ़ना एक असंभव सपना था।
इसी उपेक्षित प्राथमिक विद्यालय में जब नई शिक्षिका सुमित्रा जी (चित्र में दर्शाई गईं) ने कदम रखा, तो उन्होंने श्यामपट पर लिखा:
“शिक्षा वह दीपक है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर जीवन में सही दिशा दिखाती है।”
विद्यालय के ब्लैकबोर्ड पर लिखे उनके शब्द—“सीखें, सिखाएँ, आगे बढ़ें, सफल बनें”—ने बच्चों के मन में यह विश्वास भर दिया कि वे भी अपनी किस्मत खुद लिख सकते हैं। सुमित्रा जी ने इन बच्चों को न केवल तात्विक ज्ञान दिया, बल्कि उनकी छिपी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें जीवन की हर बड़ी चुनौती से लड़ना सिखाया।
भाग 1: अभावों से प्रतिभा की उड़ान (रानी, चंद्रकला और गंगा की सफलता)
सुमित्रा जी की प्रेरणा से विद्यालय की तीन होनहार बेटियों ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से इतिहास रच दिया:
रानी (राज्य स्तरीय खो-खो चैंपियन): घर की स्थिति बेहद खराब होने के कारण रानी स्कूल के बाद जंगल से लकड़ी बीनती थी। उसकी फूर्ती को पहचानकर सुमित्रा जी ने उसे खेल के लिए प्रेरित किया। गाँव की पथरीली मिट्टी पर कड़ा अभ्यास कर और शिक्षिका के सहयोग से रानी ने जिला, संभाग और अंततः राज्य स्तरीय खो-खो प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
चंद्रकला (चित्रकला में मध्य प्रदेश में प्रथम): शांत स्वभाव की चंद्रकला कोयले और पत्तों के रस से चित्र बनाती थी। सुमित्रा जी ने उसे पुराने चार्ट पेपर और रंग उपलब्ध कराए। बाल दिवस पर आयोजित राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता में “सतपुड़ा की गोद में प्रकृति और इंसान का संघर्ष” विषय पर उसकी कला ने पूरे मध्य प्रदेश में प्रथम स्थान पाया।
गंगा (नेशनल क्रिकेट अकादमी – NCA का सफर): पेड़ की टहनी को बल्ला बनाकर खेलने वाली गंगा के क्रिकेट प्रेम के समाज द्वारा ताने मिलने पर सुमित्रा जी उसकी ढाल बनीं। अपनी तेज गेंदबाजी और बल्लेबाजी के दम पर गंगा ने नेशनल क्रिकेट अकादमी (NCA) के कैंप तक का कठिन सफर तय किया।
भाग 2: बाढ़ की रात और शिक्षिका की अद्भुत सूझ-बूझ
सतपुड़ा में मानसून के दौरान एक शाम अचानक आई आपदा ने इन सबकी परीक्षा ली। मूसलाधार बारिश के कारण पास की नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ गया और धमना प्राथमिक विद्यालय के चारों ओर भयानक बाढ़ आ गई। उस समय विद्यालय में रानी, चंद्रकला, गंगा और कई छोटे बच्चे मौजूद थे।
सुरक्षित बचाव: बच्चों की चीखें सुनकर भी सुमित्रा जी ने हिम्मत नहीं खोई। अपनी सूझ-बूझ का परिचय देते हुए उन्होंने सभी बच्चों को विद्यालय की मजबूत छत और ऊपरी मंजिल के सुरक्षित कक्ष की ओर पहुँचाया। रानी और गंगा जैसी जुझारू बच्चियों ने भी आगे बढ़कर छोटे बच्चों को संभालने में उनकी मदद की।
घरों के दीये बुझने से बचाए: पानी का बहाव निचले इलाकों की कच्ची बस्तियों की तरफ भी बढ़ रहा था, जिससे लोगों के घरों और चूल्हों के दीये हमेशा के लिए बुझ जाने का खतरा था। सुमित्रा जी ने तुरंत अपने साधनों और सूझ-बूझ से गाँव के सुरक्षित लोगों को सतर्क किया, जिससे समय रहते निचले इलाकों के घरों को खाली करवाया गया और जरूरी सामान व जिंदगियाँ बचा ली गईं।
निष्कर्ष
रात भर की मूसलाधार बारिश और संघर्ष के बाद जब सुबह सूरज की पहली किरण सतपुड़ा की चोटियों पर पड़ी, तो चारों तरफ तबाही के निशान जरूर थे, लेकिन धमना गाँव के बच्चों की साँसें सुरक्षित थीं और उनके घरों के दीये बुझने से बच गए थे।
रानी, चंद्रकला और गंगा की सफलता और उस बाढ़ की रात सुमित्रा जी के दिखाए गए साहस ने साबित कर दिया कि यदि जीवन में एक समर्पित शिक्षक का साथ हो, तो अभावों और आपदाओं के पहाड़ भी हौसलों के आगे झुक जाते हैं।
Nirmal Das Mankar
State Co-ordinator
DA-3, NCDHR
Gandhi Bhawan parisar,
Shyamla Hills road, Bhopal (MP)
7354089988 (mobile)
Email
Nirmalda3@gmail.com
