शिक्षा मे आरक्षित पद खाली क्यों?
आपके द्वारा साझा की गई बहुजन टाइम्स की खबर के आधार पर मूल सवाल यह है कि जब संविधान में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए
शिक्षा मे आरक्षित पद खाली क्यों?
इस विषय पर सामाजिक न्याय, शिक्षा में समान अवसर और संवैधानिक अधिकारों को केंद्र में रखकर एक विचारोत्तेजक लेख प्रस्तुत है। समाचार में दिए गए आँकड़ों को रिपोर्ट में प्रकाशित दावों के रूप में लिया गया है; अंतिम प्रकाशन से पहले आधिकारिक आँकड़ों से उनका सत्यापन करना उचित होगा।
# आरक्षण का मज़ाक या सामाजिक न्याय से दूरी?
## केंद्रीय विश्वविद्यालयों में SC, ST और OBC के हजारो पद खाली रहने की असली वजह क्या?
**लेखक: निर्मल दास मानकर**
### प्रस्तावना : संविधान में अधिकार, लेकिन व्यवस्था में कितनी हिस्सेदारी?
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, सम्मान और अवसर की गारंटी देता है। सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को शिक्षा और रोजगार में उचित अवसर दिलाने के लिए अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसका उद्देश्य केवल नौकरी देना नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता को कम करना और शासन, शिक्षा तथा ज्ञान के संस्थानों में इन समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
लेकिन जब केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर जैसे प्रतिष्ठित पदों पर आरक्षित सीटें वर्षों तक खाली रहने की खबर सामने आती है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—क्या आरक्षण का उद्देश्य वास्तव में पूरा हो रहा है?
18 अक्टूबर 2026 की *बहुजन टाइम्स* में प्रकाशित खबर के अनुसार, 56 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लगभग चार हजार आरक्षित शिक्षकीय पद खाली होने और प्रोफेसर स्तर पर SC के 64 प्रतिशत तथा OBC के 80 प्रतिशत पद रिक्त होने का दावा किया गया है। इन आँकड़ों का आधिकारिक विवरण और उनकी संबंधित तिथि से पुष्टि आवश्यक है। फिर भी, संसद में पहले प्रस्तुत आँकड़े केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षित पदों की गंभीर समस्या की ओर संकेत करते हैं।
जुलाई 2025 में राज्यसभा में प्रस्तुत सरकारी आँकड़ों के अनुसार, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर पदों की रिक्ति विशेष रूप से अधिक थी। SC, ST और OBC समुदायों के लिए निर्धारित पदों में भी बड़ी संख्या में पद खाली थे।
सवाल केवल रिक्तियों का नहीं है। असली सवाल यह है कि **जिन समुदायों को ऐतिहासिक वंचना से बाहर निकालने के लिए आरक्षण दिया गया, उन्हीं की भागीदारी सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं दे पा रही है?**
### 1. पहली वजह : आरक्षण के प्रावधान और उनके क्रियान्वयन के बीच दूरी
आरक्षण का प्रावधान बना देना और उसे ईमानदारी से लागू करना दो अलग-अलग बातें हैं।
यदि किसी विश्वविद्यालय में आरक्षित पद स्वीकृत हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं होती, विज्ञापन नियमित रूप से नहीं निकलते या रिक्त पद वर्षों तक लंबित रहते हैं, तो पात्र अभ्यर्थियों को अवसर नहीं मिल पाता।
सरकारी विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के कारण शिक्षकों की नियुक्ति की जिम्मेदारी संबंधित संस्थानों के सक्षम निकायों पर होती है। शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) दिशा-निर्देश जारी कर सकते हैं, लेकिन वास्तविक भर्ती विश्वविद्यालयों को ही पूरी करनी होती है।
यहीं निगरानी और जवाबदेही का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि किसी विश्वविद्यालय में आरक्षित पद लगातार खाली हैं, तो यह जानना जरूरी है कि भर्ती में देरी किस स्तर पर हुई, कितने विज्ञापन निकले, कितने अभ्यर्थियों ने आवेदन किया और नियुक्तियाँ क्यों नहीं हो सकीं।
बिना इन सवालों के जवाब दिए केवल आरक्षण की नीति को दोष देना समस्या का समाधान नहीं है।
### 2. दूसरी वजह : भर्ती प्रक्रिया में देरी और प्रशासनिक उदासीनता
विश्वविद्यालयों में शिक्षक भर्ती एक लंबी प्रक्रिया है। विज्ञापन, आवेदन की जाँच, पात्रता निर्धारण, शोध और अकादमिक उपलब्धियों का मूल्यांकन, साक्षात्कार, चयन समिति की अनुशंसा तथा नियुक्ति आदेश—इन सभी चरणों में समय लगता है।
लेकिन जब प्रक्रिया असामान्य रूप से लंबी हो जाती है, तब उसका नुकसान अभ्यर्थियों और विद्यार्थियों, दोनों को होता है।
योग्य उम्मीदवार दूसरे संस्थानों में चले जाते हैं। कुछ उम्मीदवार आयु सीमा, रोजगार संबंधी परिस्थितियों या अन्य कारणों से अवसर खो सकते हैं। दूसरी ओर, विद्यार्थियों को पर्याप्त शिक्षक नहीं मिलते और शोध कार्य प्रभावित होता है।
यदि सामान्य पदों की तुलना में आरक्षित पद अधिक समय तक खाली रहते हैं, तो विश्वविद्यालयों को इसका श्रेणीवार और पदवार स्पष्टीकरण सार्वजनिक करना चाहिए।
**प्रशासनिक देरी का समाधान भर्ती को समयबद्ध बनाना है, न कि आरक्षण की आवश्यकता पर प्रश्नचिह्न लगाना।**
### 3. तीसरी वजह : ‘उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिला’ की कसौटी
आरक्षित पदों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी उम्मीदवार को वास्तव में निर्धारित अकादमिक मानकों पर परखा गया, या चयन प्रक्रिया में इस्तेमाल किए गए मानदंडों की पारदर्शिता पर्याप्त थी?
विश्वविद्यालयों में योग्यता, शोध, प्रकाशन, अध्यापन अनुभव और साक्षात्कार जैसी कसौटियाँ महत्वपूर्ण हैं। इनका पालन निष्पक्ष रूप से होना चाहिए। लेकिन यदि चयन समिति किसी आरक्षित पद के लिए उम्मीदवार को अनुपयुक्त घोषित करती है, तो उस निर्णय का आधार स्पष्ट और अभिलेखित होना चाहिए।
‘नॉट फाउंड सूटेबल’ अर्थात उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिलने की स्थिति में यह जाँचना आवश्यक है कि पात्रता की शर्तें क्या थीं, कितने उम्मीदवार साक्षात्कार तक पहुँचे, मूल्यांकन कैसे हुआ और क्या नियमों का समान रूप से पालन किया गया।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी उम्मीदवार को अनुपयुक्त घोषित कर देना अपने आप में जातिगत भेदभाव का प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि ऐसे निर्णय बार-बार हों और किसी विशेष सामाजिक वर्ग पर असमान प्रभाव दिखाई दे, तो स्वतंत्र समीक्षा की आवश्यकता बढ़ जाती है।
पारदर्शिता से ही वास्तविक कमी और संभावित पक्षपात के बीच अंतर किया जा सकता है।
### 4. चौथी वजह : सामाजिक पूर्वाग्रह और संस्थागत प्रतिनिधित्व की चुनौती
भारतीय समाज में जाति आधारित भेदभाव का इतिहास रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी सामाजिक पृष्ठभूमि, संसाधनों की उपलब्धता और अवसरों तक पहुँच ने लोगों की प्रगति को प्रभावित किया है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय या प्रत्येक चयन समिति भेदभाव करती है। लेकिन यह मान लेना भी उचित नहीं कि संस्थागत प्रक्रियाएँ सामाजिक पूर्वाग्रहों से पूरी तरह मुक्त हैं।
जब चयन प्रक्रिया में मानवीय निर्णय शामिल होते हैं, तब स्पष्ट नियम, निष्पक्ष मूल्यांकन, शिकायत निवारण और स्वतंत्र निगरानी अत्यंत आवश्यक हो जाते हैं।
SC, ST और OBC समुदायों के शिक्षकों की भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व का विषय नहीं है। यह उच्च शिक्षा में विविध सामाजिक अनुभवों, व्यापक दृष्टिकोण और समान अवसरों की संस्कृति को मजबूत करने से भी जुड़ा है।
इसलिए विश्वविद्यालयों को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें प्रत्येक योग्य अभ्यर्थी को बिना किसी सामाजिक पूर्वाग्रह के अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर मिले।
### 5. पाँचवीं वजह : उच्च शिक्षा तक पहुँच में असमानता
प्रोफेसर बनने की यात्रा एक नियुक्ति विज्ञापन से शुरू नहीं होती। यह स्कूली शिक्षा, स्नातक, स्नातकोत्तर, शोध, पीएचडी, शोधपत्रों, अकादमिक मार्गदर्शन और अध्यापन के अनुभव से होकर गुजरती है।
यदि किसी समुदाय के विद्यार्थियों को शुरुआती शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण संस्थान, पुस्तकालय, शोध संसाधन, मार्गदर्शक और आर्थिक सहायता कम उपलब्ध होती है, तो उच्च शिक्षा के शीर्ष पदों तक पहुँचने की उनकी यात्रा अधिक कठिन हो सकती है।
यहाँ सरकार और विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल रिक्त पद भरने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोधवृत्ति, मार्गदर्शन, शोध सुविधाओं और अकादमिक अवसरों तक समान पहुँच सुनिश्चित करने पर भी काम करना होगा।
हालाँकि, उम्मीदवारों की उपलब्धता की वास्तविक स्थिति जानने के लिए विश्वविद्यालयवार आवेदन, पात्रता और चयन के आँकड़े आवश्यक हैं। बिना प्रमाण के यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि रिक्तियों का कारण केवल योग्य उम्मीदवारों की कमी है या केवल प्रशासनिक भेदभाव।
### 6. छठी वजह : जवाबदेही की प्रभावी व्यवस्था का अभाव
यदि किसी संस्था में कोई पद लंबे समय तक खाली रहता है, तो सामान्यतः यह पूछा जाना चाहिए कि उसे कब भरा जाएगा। आरक्षित पदों के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए, बल्कि सामाजिक न्याय के महत्व को देखते हुए निगरानी और अधिक प्रभावी होनी चाहिए।
प्रत्येक केंद्रीय विश्वविद्यालय को अपनी वेबसाइट पर निम्नलिखित जानकारी नियमित रूप से उपलब्ध करानी चाहिए—
1. SC, ST, OBC और अन्य संबंधित श्रेणियों के स्वीकृत पद, भरे पद तथा रिक्त पद।
2. प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के अलग-अलग आँकड़े।
3. लंबित बैकलॉग पदों की संख्या और भर्ती की वर्तमान स्थिति।
4. विज्ञापन जारी होने, आवेदन, चयन और नियुक्ति की समय-सीमा।
5. उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिलने के मामलों का नियमसम्मत विवरण।
6. भर्ती में देरी के कारण और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही।
इन आँकड़ों का नियमित ऑडिट होना चाहिए। संसद और संबंधित नियामक संस्थाओं के सामने भी प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी चाहिए।
### 7. क्या समाधान केवल नई भर्तियाँ निकालना है?
नई भर्तियाँ निकालना जरूरी है, लेकिन समस्या के स्थायी समाधान के लिए व्यापक कदम उठाने होंगे।
**पहला**, सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षित रिक्तियों और बैकलॉग का समयबद्ध सत्यापन किया जाए।
**दूसरा**, लंबे समय से खाली पदों को भरने के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की जाए और भर्ती की नियमित समीक्षा हो।
**तीसरा**, चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए। निर्धारित मानदंड, मूल्यांकन की प्रक्रिया और निर्णयों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए।
**चौथा**, यदि किसी भर्ती में ‘उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिला’ का निर्णय लिया जाता है, तो उसकी नियमानुसार समीक्षा हो और जहाँ आवश्यक हो, नियमों के अनुरूप पुनः विज्ञापन जारी किया जाए।
**पाँचवाँ**, SC, ST और OBC वर्गों के योग्य शोधार्थियों को शोधवृत्ति, अकादमिक मार्गदर्शन और करियर संबंधी सहायता उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे उच्च शिक्षा के अध्यापन और शोध क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।
**छठा**, जातिगत भेदभाव की शिकायतों के लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
**सातवाँ**, प्रत्येक विश्वविद्यालय के प्रदर्शन का मूल्यांकन केवल कुल नियुक्तियों से नहीं, बल्कि आरक्षित पदों की पूर्ति, भर्ती में लगे समय और नियमों के पालन के आधार पर भी किया जाए।
### 8. सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल नौकरी तक सीमित नहीं
विश्वविद्यालय समाज के बौद्धिक विकास के केंद्र होते हैं। वहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थी देश का भविष्य तैयार करते हैं। यदि इन संस्थानों में शिक्षक पद बड़ी संख्या में खाली रहें, तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
और यदि आरक्षित पदों की रिक्तियाँ लगातार बनी रहें, तो सामाजिक न्याय के उद्देश्य पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
आरक्षण किसी समुदाय पर उपकार नहीं है। यह संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत समान अवसर और ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने का एक माध्यम है। इसका उद्देश्य योग्यता को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन सामाजिक बाधाओं को कम करना है जिनके कारण अवसरों तक पहुँच असमान रही है।
इसलिए आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में भावनात्मक बहस करने के बजाय हमें वास्तविक आँकड़ों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और जवाबदेही पर ध्यान देना चाहिए।
### निष्कर्ष : संवैधानिक व्यवस्था का मूल्य उसके क्रियान्वयन से तय होगा
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षित पदों की रिक्तियों के पीछे एक ही कारण मान लेना उचित नहीं होगा। प्रशासनिक देरी, भर्ती प्रक्रियाओं की जटिलता, उच्च शिक्षा तक असमान पहुँच, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही जैसे पहलुओं की अलग-अलग जाँच आवश्यक है।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—यदि किसी समुदाय के लिए निर्धारित पद लंबे समय तक खाली रहते हैं, तो केवल नियमों का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि वे नियम व्यवहार में प्रभावी हों।
**संविधान में आरक्षण का प्रावधान होना पहला कदम है; उसका निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन ही सामाजिक न्याय की वास्तविक कसौटी है।**
सरकार, UGC और विश्वविद्यालय प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि रिक्त पद कब तक भरे जाएँगे, भर्ती में देरी क्यों हो रही है और प्रत्येक संस्था अपने दायित्वों का पालन कैसे सुनिश्चित करेगी।
सामाजिक न्याय तभी सार्थक होगा, जब अवसर केवल कागजों पर नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में भी उपलब्ध हों। विश्वविद्यालयों के दरवाजे हर योग्य विद्यार्थी और शिक्षक के लिए खुले होने चाहिए—बिना जातिगत भेदभाव, बिना अनावश्यक बाधाओं और बिना संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी के।
**आरक्षण का सम्मान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि पारदर्शी भर्ती, जवाबदेह प्रशासन और समान अवसरों को सुनिश्चित करने से होगा।**
— *निर्मल दास मानकर*
### लेख को और मजबूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ
* संसद में 23 जुलाई 2025 को शिक्षा मंत्रालय ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकीय पदों की श्रेणीवार स्थिति पर जानकारी दी थी। [राज्यसभा का आधिकारिक उत्तर](https://sansad.in/getFile/annex/268/AU368_K53ExU.pdf?source=pqars&utm_source=chatgpt.com)।
* PRS India की शिक्षा बजट संबंधी समीक्षा में जनवरी 2025 के आसपास केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुल शिक्षकीय पदों में लगभग 29% रिक्ति का उल्लेख है। [शिक्षा क्षेत्र की समीक्षा](https://prsindia.org/budgets/parliament/demand-for-grants-2026-27-analysis-education?utm_source=chatgpt.com)।
* शिक्षा मे आरक्षित पद खाली क्यों? उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय की अधूरी कसौटी”
भी प्रभावी रहेगा। इससे लेख का केंद्र केवल आरोप लगाने के बजाय मूल कारणों, प्रमाणों और समाधान पर बना रहता है।
