प्रधान पाठक एकशिक्षकजिसने मुझेस्कुल से दुर होने नही दिया

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प्रधानपाठक एकशिक्षक, जिसने मुझे स्कूल से दूर नहीं होने दिया

श्रद्धांजलि: स्वर्गीय श्री गंगा प्रसाद अग्रवाल सर, सारनी

श्रद्धांजलि

लेखक: निर्मल दास मानकर 97354089988

कुछ खबरें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़कर आँखें नम हो जाती हैं। कुछ तस्वीरें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर बीते हुए दिनों की यादें मन के दरवाजे पर दस्तक देने लगती हैं। और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जीवन से विदा हो जाने के बाद भी हमारी स्मृतियों में जीवित रहते हैं।

आज फेसबुक पर अपने प्रिय शिक्षक, सारनी के आदरणीय अग्रवाल सर के देहावसान की खबर पढ़कर मेरा मन भीतर तक विचलित हो गया। कुछ देर तक मैं उस तस्वीर को देखता रहा। तस्वीर में उनका चेहरा था, लेकिन मेरी आँखों के सामने तो वर्षों पुराना वह विद्यालय घूम रहा था, जहाँ मैं आठवीं कक्षा में पढ़ा करता था और अग्रवाल सर हमें अंग्रेजी पढ़ाया करते थे।

समय कितना बदल गया! विद्यालय के वे दिन पीछे छूट गए। हम विद्यार्थी बड़े हो गए, अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए, लेकिन हमारे बचपन को सँवारने वाले शिक्षक धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनते चले गए।

आज अग्रवाल सर के निधन की खबर ने मुझे फिर उसी कक्षा में पहुँचा दिया, जहाँ एक विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर था, गणित और विज्ञान से घबराता था, लेकिन उसके जीवन में एक ऐसे प्रधान अध्यापक थे, जिन्होंने उसे विद्यालय से पूरी तरह निराश होकर लौटने नहीं दिया।

वह कमजोर विद्यार्थी कोई और नहीं, मैं स्वयं था।

पढ़ाई में कमजोर था, लेकिन उम्मीद अभी बाकी थी

बचपन में मैं पढ़ने-लिखने में बहुत तेज नहीं था। आज की भाषा में कहूँ तो मैं पढ़ाई में एक डफर विद्यार्थी था। गणित के सवाल मुझे परेशान करते थे और विज्ञान के विषय भी आसानी से समझ में नहीं आते थे। पढ़ाई में अच्छे विद्यार्थियों को देखकर कभी-कभी मन में हीनभावना भी पैदा हो जाती थी।

लेकिन विद्यालय केवल किताबों, परीक्षाओं और अंकों का नाम नहीं होता। विद्यालय वह स्थान भी होता है, जहाँ विद्यार्थी अपने व्यक्तित्व को पहचानना सीखता है। वहाँ कुछ शिक्षक ऐसे मिल जाते हैं, जो केवल हमारी गलतियाँ नहीं देखते, बल्कि हमारी कमजोरियों के पीछे छिपी संभावनाओं को भी समझते हैं।

अग्रवाल सर मेरे लिए ऐसे ही शिक्षक थे।

वे हमें अंग्रेजी पढ़ाते थे। उस समय शायद मुझे इस बात का एहसास नहीं था कि किसी शिक्षक का व्यवहार विद्यार्थी के मन पर कितनी गहरी छाप छोड़ सकता है। विद्यार्थी के लिए शिक्षक का एक वाक्य हौसला बन जाता है और एक कठोर निर्णय जीवन भर की निराशा भी बन सकता है।

मुझे नहीं मालूम कि अग्रवाल सर को उस समय मेरे भविष्य के बारे में क्या उम्मीदें रही होंगी, लेकिन जीवन के उस कठिन मोड़ पर उनका व्यवहार आज भी मुझे याद है।

जब देश की परिस्थितियों ने विद्यार्थियों को भी प्रभावित किया

यह उन दिनों की बात है, जब देश ने एक दुखद राजनीतिक घटना का सामना किया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या कर दी गई थी। उसके बाद देश के कई हिस्सों में हिंसा और सांप्रदायिक तनाव का वातावरण बन गया था।

समाज में जाति और धर्म के नाम पर नफरत फैल रही थी। अनेक परिवार भय और असुरक्षा के माहौल से गुजर रहे थे। ऐसी परिस्थितियों का प्रभाव बच्चों और विद्यार्थियों पर भी पड़ता था। पढ़ाई का नियमित वातावरण प्रभावित होता था और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ जाती थी।

उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह थे। उस दौर की परिस्थितियों में विद्यार्थियों को राहत देने के लिए जनरल प्रमोशन की व्यवस्था की गई थी। बहुत से विद्यार्थियों को इसका लाभ मिला।

कई विद्यार्थियों के मन में यह धारणा बन गई कि जब जनरल प्रमोशन मिल रहा है, तो परीक्षा की तैयारी में अधिक मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है। पढ़ाई में पहले से कमजोर विद्यार्थियों के लिए तो यह धारणा और भी आकर्षक थी।

मैं भी उन्हीं विद्यार्थियों में से एक था।

मुझे लगता था कि जब सभी को आगे की कक्षा में भेज दिया जाएगा, तो मेरी कमजोर पढ़ाई शायद मेरे रास्ते में नहीं आएगी। उस समय विद्यार्थी होने के नाते मैं परिस्थितियों को पूरी तरह समझ नहीं पाता था। यह नहीं सोचता था कि पढ़ाई में आज की लापरवाही आगे चलकर कितनी बड़ी परेशानी बन सकती है।

लेकिन हर व्यवस्था के कुछ नियम होते हैं। जनरल प्रमोशन की चर्चा के बावजूद आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा और ग्यारहवीं कक्षा की परीक्षा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होनी थी।

यहीं से मेरी परेशानी शुरू हुई।

गणित और विज्ञान ने मेरा रास्ता रोक दिया

परीक्षा हुई। परिणाम आया। मेरी आशंकाएँ सच साबित हुईं।

मैं गणित और विज्ञान की पूरक परीक्षा में भी सफल नहीं हो पाया।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि उस असफलता के पीछे केवल मेरी योग्यता की कमी नहीं थी। पढ़ाई के प्रति मेरी लापरवाही, परिस्थितियों को गलत समझना और जनरल प्रमोशन के भरोसे बैठ जाना भी इसके कारण थे।

उस समय, हालांकि, इन बातों को समझने की मेरी उम्र नहीं थी। मेरे सामने केवल एक समस्या थी—मैं परीक्षा में असफल हो गया था।

विद्यालय में मेरे जैसे अन्य विद्यार्थी भी थे, जो परीक्षा में सफल नहीं हो सके थे। हम सबके मन में चिंता थी। आगे क्या होगा? क्या हमें पढ़ाई जारी रखने का अवसर मिलेगा? क्या हमारा भविष्य यहीं रुक जाएगा?

इसी बीच विद्यालय से संबंधित एक ऐसा निर्णय सामने आया, जिसने हम सभी को निराश कर दिया।

हम विद्यार्थियों को टी.सी. देकर विद्यालय छोड़ने के लिए कहा गया।

जिस विद्यालय में हम इतने वर्षों से पढ़ रहे थे, जहाँ हमारे मित्र थे, कक्षाएँ थीं, शिक्षक थे और बचपन की अनेक यादें थीं, उसी विद्यालय को छोड़ने की बात हमारे लिए बहुत कठिन थी।

हमने अपनी असफलता की कीमत समझनी शुरू ही की थी कि अब विद्यालय से अलग होने का भय भी सामने आ गया।

एक असफल परीक्षा विद्यार्थी के आत्मविश्वास को पहले ही कमजोर कर देती है। ऐसे समय में यदि उसे यह महसूस होने लगे कि उसके लिए सारे दरवाजे बंद हो गए हैं, तो वह अपने भविष्य के प्रति निराश भी हो सकता है।

हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।

तब सामने आए अग्रवाल सर

ऐसे कठिन समय में अग्रवाल सर ने हमें विद्यालय में आकर बैठने की अनुमति दे दी।

यह बात सुनने में बहुत छोटी लग सकती है। किसी विद्यार्थी को विद्यालय में बैठने की अनुमति देना आखिर कितना बड़ा काम है?

लेकिन किसी असफल विद्यार्थी से पूछिए कि उसके लिए विद्यालय के दरवाजे खुले रहने का क्या अर्थ होता है।

हमारे लिए यह अनुमति केवल विद्यालय में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। यह हमारे भीतर बची हुई उम्मीद को जीवित रखने का अवसर था।

अग्रवाल सर प्रधान अध्यापक थे। विद्यालय के नियमों और परीक्षा व्यवस्था की अपनी सीमाएँ थीं। परीक्षा में सफल होना हमारी जिम्मेदारी थी, लेकिन असफल होने के बाद भी हमें सीखने का अवसर मिलना चाहिए—उनके इस व्यवहार में मुझे इसी भावना की झलक दिखाई देती है।

उन्होंने हमें विद्यालय में बैठने दिया। हम अपने साथियों के साथ विद्यालय आते और कक्षा में बैठते।

मैं आज भी सोचता हूँ कि उस समय यदि अग्रवाल सर हमें विद्यालय आने से पूरी तरह रोक देते, तो हमारे मन पर क्या प्रभाव पड़ता?

शायद हम अपने आपको इतना असफल मान लेते कि आगे पढ़ने का साहस जुटाना भी मुश्किल हो जाता।

लेकिन उन्होंने हमें पूरी तरह निराश होकर लौटने नहीं दिया।

उन्होंने हमारे सामने भविष्य के सारे रास्ते बंद नहीं किए।

उनका यह व्यवहार मेरे मन में आज भी एक ऐसी स्मृति बनकर सुरक्षित है, जिसे मैं चाहकर भी भूल नहीं सकता।

शिक्षक का असली कद

शिक्षक का कद केवल उसकी कुर्सी, पद या विषय के ज्ञान से नहीं मापा जाता। उसका वास्तविक कद इस बात से भी मापा जाता है कि वह अपने विद्यार्थियों की कमजोरियों और कठिनाइयों के समय कैसा व्यवहार करता है।

एक विद्यार्थी परीक्षा में असफल हो सकता है। कोई गणित में कमजोर हो सकता है, कोई अंग्रेजी में और कोई विज्ञान में। किसी का पारिवारिक वातावरण पढ़ाई के अनुकूल नहीं होता, तो कोई परिस्थितियों के कारण पीछे रह जाता है।

लेकिन क्या परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल हो जाने के बराबर है?

नहीं।

एक अच्छा शिक्षक इस अंतर को समझता है। वह जानता है कि परीक्षा किसी विद्यार्थी की एक समय की तैयारी का मूल्यांकन कर सकती है, लेकिन उसके पूरे जीवन की संभावनाओं का नहीं।

अग्रवाल सर के उस निर्णय को मैं आज इसी दृष्टि से देखता हूँ।

उन्होंने हमें विद्यालय में बैठने दिया। इस घटना को मैं उनकी उदारता और विद्यार्थी के प्रति संवेदनशीलता के रूप में याद करता हूँ। उन्होंने हमारे सामने सीखने की संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया।

उस समय मैं शायद उनके इस व्यवहार की गहराई को नहीं समझ पाया था। मेरे लिए वह राहत की बात थी। आज, वर्षों बाद, जब जीवन के अनेक अनुभवों से गुजर चुका हूँ, तब समझ आता है कि किसी विद्यार्थी को समय पर दिया गया अवसर कितना मूल्यवान हो सकता है।

कभी-कभी किसी का जीवन बदलने के लिए बहुत बड़ा भाषण देने की जरूरत नहीं होती। एक छोटा-सा अवसर, थोड़ा-सा विश्वास और मानवीय व्यवहार ही काफी होता है।

वर्षों बाद समझ में आया उनका महत्व

जीवन आगे बढ़ता गया। विद्यालय के दिन पीछे छूटते गए। पढ़ाई, परिवार, कामकाज और जीवन की जिम्मेदारियों ने अपने-अपने रास्ते बना लिए।

लेकिन बचपन की कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुँधली नहीं होतीं। वे मन के किसी कोने में सुरक्षित रहती हैं और किसी घटना के कारण अचानक जीवित हो उठती हैं।

मेरे लिए अग्रवाल सर की स्मृति भी ऐसी ही है।

जब मैंने फेसबुक पर उनके निधन की खबर पढ़ी, तो मन में सबसे पहले वही विद्यालय आया। वही आठवीं कक्षा, वही अंग्रेजी की पढ़ाई, वही परीक्षा में असफल होने की पीड़ा और फिर विद्यालय में बैठने की अनुमति मिलने से पैदा हुई राहत।

उस समय शायद मैंने उन्हें धन्यवाद भी नहीं दिया होगा। विद्यार्थी जीवन में हम अक्सर अपने शिक्षकों के योगदान को सामान्य समझ लेते हैं। हमें लगता है कि शिक्षक का काम पढ़ाना है और प्रधान अध्यापक का काम विद्यालय चलाना।

लेकिन समय बीतने पर समझ आता है कि शिक्षक हमारे जीवन की नींव में अपना योगदान देते हैं। वे हमें केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देते, बल्कि अपने व्यवहार से यह भी सिखाते हैं कि कठिन समय में मनुष्य को मनुष्य के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए।

आज अग्रवाल सर हमारे बीच नहीं हैं। उनसे मिलकर अपनी पुरानी स्मृतियाँ साझा करने का अवसर अब शायद कभी नहीं मिलेगा। मन में यह कसक भी रहेगी कि काश, जीवन की व्यस्तताओं के बीच एक बार उनसे मिल पाता और कह पाता—

“सर, मैं पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी था। उस समय शायद आपकी उदारता का महत्व नहीं समझ पाया था, लेकिन आज भी मुझे याद है कि आपने हमें विद्यालय से पूरी तरह दूर नहीं होने दिया। आपकी वह बात और वह व्यवहार मेरी स्मृतियों में जीवित है।”

काश, मैं उनसे यह सब कह पाता।

स्मृतियों में जीवित रहेंगे अग्रवाल सर

आज जब समाज में शिक्षा को केवल अंकों, डिग्रियों और प्रतियोगिताओं से जोड़कर देखा जाता है, तब अग्रवाल सर जैसे शिक्षकों की स्मृति हमें शिक्षा के मानवीय पक्ष की याद दिलाती है।

हर विद्यार्थी एक जैसा नहीं होता। सबकी समझने की गति अलग होती है। किसी को विषय जल्दी समझ में आ जाता है, किसी को बार-बार अभ्यास की जरूरत होती है। कोई परीक्षा में अच्छे अंक लाता है, तो कोई असफलताओं से सीखते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।

यदि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल सफल विद्यार्थियों को आगे बढ़ाना हो, तो कमजोर विद्यार्थियों के लिए जगह कहाँ बचेगी?

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तो यह होना चाहिए कि विद्यार्थी की कमजोरी को पहचानकर उसे बेहतर बनने का अवसर दिया जाए।

मेरे जीवन का वह पुराना प्रसंग मुझे यही सिखाता है कि शिक्षक का संवेदनशील व्यवहार विद्यार्थी के आत्मसम्मान को बचाए रखने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

अग्रवाल सर की स्मृति में मैं कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं कहना चाहता। मैं तो केवल अपने जीवन का एक छोटा-सा अनुभव साझा करना चाहता हूँ, क्योंकि मेरे लिए उनकी याद इसी अनुभव से जुड़ी हुई है।

मैं उन विद्यार्थियों में से था, जो पढ़ाई में पीछे रह गए थे। मैं गणित और विज्ञान की पूरक परीक्षा में सफल नहीं हो पाया था। मेरे सामने विद्यालय छोड़ने की स्थिति आ गई थी। लेकिन अग्रवाल सर ने हमें विद्यालय में बैठने की अनुमति दी।

आज यह घटना मुझे बताती है कि किसी शिक्षक का मानवीय व्यवहार वर्षों बाद भी विद्यार्थी के हृदय में सम्मान के साथ जीवित रह सकता है।

सर, आप आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपकी स्मृति मेरे मन में हमेशा रहेगी।

आपने हमें अंग्रेजी पढ़ाई थी, लेकिन आपके व्यवहार से मैंने जीवन का एक और पाठ सीखा—किसी की कमजोरी देखकर उसके लिए दरवाजा बंद मत करो। हो सके, तो उसे आगे बढ़ने का एक अवसर अवश्य दो।

यही एक सच्चे शिक्षक की पहचान है।

आपके चरणों में विनम्र श्रद्धांजलि।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और शोकाकुल परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति दे।

ॐ शांति।

— निर्मल दास मानकर मो. न. 97354089988
सारनी की स्मृतियों से, अपने प्रिय शिक्षक स्वर्गीय श्री गंगा प्रसाद अग्रवाल सर को सादर नमन।

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