एकाधिकार का साया और लोकतंत्र: : इंडिगो घटना और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की भविष्यदृष्टि
एकाधिकार का साया और लोकतंत्र: : इंडिगो घटना और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की भविष्यदृष्टि
भारत में इंडिगो एयरलाइंस की हालिया उड़ान रद्दीकरण घटना ने एक असुविधाजनक सत्य को फिर उजागर किया कि धीरे-धीरे और चुपचाप हमारे बाज़ार का संतुलन कुछ चुनिंदा हाथों में सिमटता जा रहा है। एयरपोर्ट पर रातभर फंसे यात्री, बर्बाद योजनाएँ, रोते बच्चे, अपनी नौकरी या परीक्षा छूटने के डर से बेचैन लोग यह केवल एक एयरलाइन की गलती नहीं थी; यह उस संरचनात्मक खतरे का संकेत था जिसकी ओर भारत पिछले एक दशक से बढ़ रहा है। एक ऐसा खतरा जहाँ उपभोक्ता के पास विकल्प घटते जाते हैं और कंपनियों के पास जवाबदेही भी।
भारत में आज इंडिगो एयरलाइंस अकेले लगभग आधी घरेलू उड़ानों पर नियंत्रण रखती है। यह स्थिति सिर्फ एक कंपनी की सफलता की कहानी नहीं है; यह उस एकाधिकार-मानसिकता की ओर इशारा भी है जहाँ प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाती है और बाजार शक्ति के केंद्र कुछ ही कॉरपोरेट दिग्गजों तक सिकुड़ जाते हैं। जब बाज़ार कुछ हाथों में केंद्रित होता है, तो सेवाओं की गुणवत्ता से लेकर कीमतों तक सब कुछ उपभोक्ता के हित से नहीं, बल्कि एकाधिकार के स्वार्थ से संचालित होने लगता है। इंडिगो के प्रकरण ने यह सच्चाई नंगी कर दी कि भारत का मध्यम वर्ग जो देश की आर्थिक रीढ़ है इन एकाधिकारवादी प्रयोगों का अनजाने में सबसे बड़ा शिकार बन चुका है।
जो यात्री एयरपोर्ट पर असहाय खड़े थे, वे बस इस दौर की तस्वीर थे; उस असुरक्षा की, जिसे भारत के पहले और सर्वाधिक दूरदर्शी अर्थशास्त्रियों में से एक डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बहुत पहले पहचान लिया था। जिस समय दुनिया पूँजीवाद और समाजवाद के बीच खड़ी थी, उस समय आंबेडकर ने States and Minorities (1947) में जो प्रस्ताव रखा वह आज इंडिगो जैसे मामलों के सामने खड़े होते ही लगभग भविष्यवाणी जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने चेताया था कि भारत जैसे विशाल और असमानता-ग्रस्त समाज में यदि बड़े उद्योगों पर राज्य का नियंत्रण नहीं होगा, तो निजी पूँजीपति धीरे-धीरे सोसाइटी की नसों पर कब्ज़ा कर लेंगे। उनकी चिंता यह नहीं थी कि निजी क्षेत्र बुरा है; बल्कि यह कि अनियंत्रित निजी शक्ति अनिवार्य रूप से एकाधिकार की ओर बढ़ती है, और एकाधिकार लोकतंत्र का सबसे खतरनाक शत्रु है।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर का राज्य समाजवाद (State Socialism) मॉडल जो तीन बुनियादी स्तंभों पर आधारित था: सार्वजनिक उद्योगों का राज्य-स्वामित्व, कृषि पर राज्य का नियंत्रण, और बीमा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण वास्तव में बाजार को समाप्त करने का नहीं, बल्कि उसे संतुलन देने का प्रस्ताव था। वे अच्छी तरह जानते थे कि भारत जैसे देश में स्वार्थ, जाति आधारित शक्ति असमानता, और सामाजिक विभाजन इन सबके बीच आर्थिक शक्ति यदि बिना किसी लगाम के बढ़ेगी, तो वह समाज को और गहरा घायल करेगी। इंडिगो की मोनोपोली इसी असंतुलन का सूक्ष्म रूप है।
कई लोग पूछते हैं कि डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को अर्थव्यवस्था की इतनी गहरी समझ कैसे थी। इसका उत्तर उनकी दृष्टि में छिपा है वे अर्थशास्त्र को कभी सिर्फ “पैसे का खेल” नहीं मानते थे। उनके लिए अर्थव्यवस्था एक नैतिक व्यवस्था थी, जहाँ बाजार शक्ति का संचय केवल आर्थिक समस्या न होकर राजनीतिक और सामाजिक समस्या भी बन जाता है। इसी कारण उन्होंने कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता, जब तक उसका आधार सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र पर न हो।
जब हजारों यात्री एक कंपनी की मनमानी के आगे असहाय दिखे, तो वही विरोधाभास सामने आया जिसकी ओर डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने चेताया था भारत में राजनीतिक रूप से हम बराबरी का दावा करते हैं, लेकिन आर्थिक जीवन में कुछ ही खिलाड़ी बाकी सब पर शक्ति का प्रयोग करते हैं। यही असमानता लोकतंत्र को अंदर से खा जाती है।
उनकी चिंताएँ केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं थीं। वे जानते थे कि जहाँ सामाजिक अन्याय सदियों से संरचित हो, वहाँ आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण असमानता को और मजबूत कर देगा। इसलिए उन्होंने कहा कि कोई भी आधुनिक संविधान नागरिकों को केवल राजनीतिक अधिकार देकर उन्हें स्वतंत्र नहीं कर सकता; वह तभी सार्थक होगा जब वह बाजार में भी उन्हें विकल्प, सुरक्षा और सम्मान दिलाए।
आज जब हम इंडिगो जैसी घटनाएँ देखते हैं या डिजिटल बाजारों में कुछ कंपनियों का बढ़ता प्रभुत्व, या रिटेल सेक्टर में उभरते एकाधिकार तो डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की वह चेतावनी और भी स्पष्ट सुनाई देती है। उन्होंने कहा था कि आधुनिक लोकतंत्र को केवल वोटों से नहीं, बल्कि आर्थिक सत्ता के विकेंद्रीकरण से सुरक्षित रखा जा सकता है।
वास्तव में, इंडिगो की उड़ानें रद्द होना समस्या नहीं है; समस्या यह है कि यात्रियों के पास कहीं और जाने का विकल्प नहीं था। और विकल्प का खत्म होना, वही क्षण है जब लोकतंत्र अपने सबसे गहरे अर्थ में घायल होने लगता है।
यह लेख किसी कंपनी के विरुद्ध नहीं है। यह उस प्रणाली के विरुद्ध है जो एकाधिकार को बिना प्रतिरोध के बढ़ने देती है। यह उस दृष्टि की पुनर्स्मृति है जिसे डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने 80 वर्ष पहले हमारे लिए छोड़ दी थी कि भारत तभी सुरक्षित रहेगा जब उसकी अर्थव्यवस्था बहु-केंद्रित, उत्तरदायी और न्यायपूर्ण होगी।
इंडिगो की घटना केवल एक अनुभव नहीं; यह एक दर्पण है। इस दर्पण में हम अपने भविष्य की झलक देखते हैं एक ऐसा भविष्य जिसमें बाजार की दशा तय करने वालों की संख्या घटती जा रही है और आम नागरिक की आवाज़ कमजोर पड़ती जा रही है।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने हमें चेताया था कि लोकतंत्र केवल संस्थानों से नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा और सम्मान से चलता है। यदि हम यह नहीं समझते, तो एकाधिकार का अंधेरा धीरे-धीरे उस रोशनी को निगल लेगा जिसे स्थापित करने के लिए डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने पूरी ज़िंदगी संघर्ष किया था।भारत को एक बार फिर उनकी दृष्टि को पढ़ने की ज़रूरत है क्योंकि समस्या 2024 की है, लेकिन समाधान 1947 में ही लिख दिया गया था। बड़ा सवाल यह है के क्या हम उन समाधानों को पढ़ने की जरूरत समझते है?
प्रेषक – विशाल कड़वे
लेखक – डॉ. महेंद्र जाधव
समता सैनिक दल
