स्वाभिमान और आत्मसम्मान के लिए महाड़ सत्याग्रह एवं जाति भेदभाव और महिलाओं के उत्पीड़न के प्रतीक मनुस्मृति दहन
स्वाभिमान और आत्मसम्मान के लिए महाड़ सत्याग्रह एवं जाति भेदभाव और महिलाओं के उत्पीड़न के प्रतीक मनुस्मृति दहन
वर्ष 1927 में डाॅ बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने महाड़ सत्याग्रह और मनुस्मृति दहन का आंदोलन महत्वपूर्ण है।सवर्णो द्वारा शुद्र अछुत दलितों के
साथ मानवीय भेदभाव रखते छुआछूत करते थे, सार्वजनिक तालाब का पानी अन्य धर्म मुस्लिम इसाई पी सकता था लेकिन शुद्र दलित तालाब के पानी को हाथ भी लगा नही सकता था,वहीं शुद्र दलित बहुजनों को हिंदू धर्म का हिस्सा मानते थे।ऐसी असामनता भेदभाव व्यवस्था के विरोध में स्वाभिमान आत्मसम्मान के लिए 20 मार्च 1927 को राजगढ़ के महाड़ के तालाब के पानी को पीने का आंदोलन किया जिसे महाड़ सत्याग्रह कहा जाता है। 24 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति ग्रंथ का दहन किया गया। मनुस्मृति ने समाज को ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र में विभाजित कर वर्ण-व्यवस्था को जन्म दिया है, जिससे दलित शुद्रो के साथ जातिवाद भेदभाव प्रारंभ हुआ, शोषण को बढ़ावा मिला है। महिलाओं को निम्न दर्जा दिया गया स्वतंत्रता सिमित की गई। लैंगिक असामनता को बल मिला कडॉ बाबासाहेब आंबेडकर कहना है कि जो संहिता जन्म के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता का भाव पैदा करती ऐसी संहिता वाले सामाजिक तौर पर विवादित ग्रंथ का दहन कियाआ।
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