अंधविश्वासी चोटी कुप्रथा पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर सामाजिक जागरूकता अभियान होनी चाहिए।

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अंधविश्वासी चोटी कुप्रथा पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर सामाजिक जागरूकता अभियान होनी चाहिए।

समाज में लड़के के जन्म होने पारिवारिक और खुद की समस्याओं को लेकर  मन्नतें पूरी होने पर काली देवी,मठारदेव बाबा दैत्य बाबाओ खुश करने के लिए  बकरे मुर्गे की बलि देने अंधविश्वासी कुप्रथा का प्रचलन वर्षों से चली आ रही है,अंधविश्वास को बनायें हुए है। काली देवी मठारदेव बाबा दैत्य बाबाओ को चोटी उतारने के कार्यक्रम में बकरे मुर्गे की बलि चढ़ाकर समाज के नाते रिश्तेदार दोस्त मित्र सामुहिक बैठ कर खाते पीते है। काली देवी और मठारदेव को प्रति रविवार सन्डे छुट्टी के दिन चोटी में बकरे मुर्गे की बलि कार्यक्रम अक्सर चैत्य माह सैकड़ों बकरे मुर्गे बलि होते हैं। ऐसे बकरे मुर्गे बलि प्रथा प्रचलन कार्यक्रमो में समाज के मांसाहारी लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। अशिक्षा और अंधविश्वास से जकड़े गरीब लोग कुप्रथा कार्यक्रम कर्ज लेकर करते हुए देखे गये है। लेकिन पढ़ें लिखे शहरों में नौकरी पेशा करने वाले लोग अंधविश्वासी कुप्रथाओ के प्रचलन को बड़े बुढ़े चली आ रही परंपरा को अपनायें चला रहे है बड़ी विडंबना है। जीवन में घटनाएं एवं परिवर्तन अपने कर्मों पर निर्भर होता है पत्थर से निर्मित देवी देवताओं पेड़ों के नीचे हल्दी कुंकुम से रंगे हुए पत्थरों पर निर्भर नही होता है। इनसे भावना वंश अंधविश्वास से जीवन में गरीबी ही आती है। धर्म जीव हत्या विरोधी है ईश्वर दयालु और कृपालु न्यायकारी होता है वह निरपराध और बेजुबान बकरे मुर्गे जानवरों की बलि कैसे स्वीकार कर सकता है, अहिंसा परमो धर्म का उपदेश देने वाले निर्दयी क्रुर कैसे हो सकते है। समाज में गलत रिती रिवाज से अहितकारी अकल्याणकारी कार्य हो रहे है अंधविश्वासी चोटी कुप्रथा पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर सामाजिक जागरूकता अभियान होनी चाहिए।

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