*देश के नौजवानों के हालात – एक सच्चा वाक़या*

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देश के नौजवानों के हालात – एक सच्चा वाक़या

✍️ बेंगलुरु से श्रवण यादव  ​

कल रात 9:30 बजे मेट्रो में था, ज़्यादा भीड़ नहीं थी, जब एक लड़की सिल्क बोर्ड मेट्रो स्टेशन से दौड़ते हुए चढ़ी और अंदर आते ही हाँफते हुए ज़मीन पर चक्कर खा कर गिर पड़ी। आस पास बैठे यात्रियों ने संभालते हुए उसे सीट पर बिठाया और चेहरे पर छींटे मारे तो होश में आई। बताया, दिन भर की दौड़ भाग में सुबह नाश्ते के बाद से कुछ भी खाने का टाइम ही नहीं मिला, न पानी पिया शायद इसीलिए चक्कर खा कर गिर गई। बातचीत में बताया कि साल भर पहले BCA कर के जॉब ढूँढ रही थी और कुछ ऑनलाइन स्किल डेवलपमेंट कोर्स कर रही। कब तक स्किल के अनुसार जॉब के इंतज़ार में घर बैठती, तो इस बीच बीते 3 महीने से दो दो फुल टाइम जॉब पकड़ लिया, एक BPO में और एक किसी कंसल्टेंसी में, मतलब दोनों नौकरियाँ मिला कर दिन के कोई 15-16 घंटे का काम, तब जाकर कुल 40-45 हज़ार कमा कर बैंगलोर की महँगाई में घर चल रहा है। घर पर माँ बाप और दो छोटी बहनें दोनों पढ़ रहीं, पापा gig वर्कर हैं, डिलीवरी का काम करते हैं, माँ चर्च में काम करके बहुत थोड़ा सा कमा लेती है। चेहरा सूखा हुआ, आँखों के नीचे गड्ढे, कोई 22-23 की उम्र में पूरे परिवार का भार कंधे पर। वो तो ग़नीमत कि मेट्रो के अंदर चक्कर खा कर गिरी, अगर सड़क पर या किसी असुरक्षित जगह पर गिरती तो क्या होता। बहरहाल बातों बातों में उसका स्टेशन मेरे से पहले आ गया, “थैंक यू अन्ना” बोल कर ज़िंदगी का सारा भार सहेजते हुए अपनी कमज़ोर लेकिन हौसले से भरपूर टाँगों पर खड़ी हुई, और गाड़ी से उतर गई। बेरोज़गारी के आँकड़े जारी करने वाले तो इसे एक “पढ़े-लिखे” युवा को दो दो रोज़गार के अवसर की तरह दिखा कर व्यवस्था की पीठ थपथपाने में भी नहीं हिचकेंगे।

 

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