शुद्र दलित वंचित बहुजन समाज आत्म स्वाभिमान से जीने की सोचे!

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शुद्र दलित वंचित बहुजन समाज आत्म स्वाभिमान से जीने की सोचे!

जिनेवा में अंतराष्ट्रीय के धर्म सम्मेलन में 200 से अधिक धर्म गुरुओ की उपस्थिति सहमति से आर्थिक और अध्यात्मिक प्रगति मानवता के लिए बौद्ध धर्म को सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डॉ बीआर अंबेडकर बाबा साहेब ने करोड़ो दलित पिछड़े वंचित बहुजन समाज को ब्राह्मण मनुवादी व्यवस्था की हजारों वर्षों की गुलामी से मुक्ति के लिए बौद्ध धर्म के धम्म को अपनाया और अपनाने के लिए प्रेरित भी किया बौद्ध धर्म को ऐसे रुप देखा और समझा कि बौद्ध धर्म समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय के मूल्यों पर आधारित है, सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक शक्ति और आत्मविश्वास के लिए अपनाया धम्म की दीक्षा ली और अपने लाखों लोगों को हिंदू धर्म के किसी भी देवी देवता ईश्वर त्यौहार उत्सव को न मानने की शपथ 22 प्रतिज्ञा दी। जीवन भर समाज के कल्याण के लिए संघर्ष और काम किया जिसमें अपने बच्चों की भी परवाह नहीं की अपने चार बच्चों की आहुति दे दी। अशिक्षा गुलामी गरीबी दरिद्रता का मुख्य कारण बताते हुए शिक्षा शेरनी का दुध है जो भी पियेगा वह दहाड़ेगा। शिक्षा के लिए प्रेरित किया, शिक्षा का अधिकार दिया,आर्थिक रुप से मजबूत, आत्मविश्वास जगाया सामाजिक रुतबा,मान सम्मान, राजनीति  प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया। बौद्ध धर्म प्रगतिवादी धर्म है जिन्हें अंधभक्त रहना पसंद है वे इस धर्म में नही आना चाहिए।उन्हें अंधभक्ति नही चाहिए ना ही बनाना चाहते है जिन्हें इस महान धर्म में आना है दृढ़ विश्वास से आये और बौद्धाचरण का अनुशरण करें।देखा जाए तो डॉ बीआर अंबेडकर बाबा साहेब ने जातिवादी विषम परिस्थिति में धैर्य संयम साहस के साथ स्वाभिमान पुर्वक जीवन जीने का प्रयास समाज देश का कल्याण जिम्मेदार नागरिक होने का बौद्ध करवाया।विश्व स्तर के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे विद्वान अर्थशास्त्रीय थे,सबसे ज्यादा प्रतिमाएं स्थापित है। सबसे ज्यादा उनकी जयंती उत्सव मनाते है।आंबेडकर के जयंती नाम की होल्डिग शुभकामनाएं वाले मोबाइल से वाट्साप होते है, जयभीम के नारे प्रतिमाओ पर  माल्यार्पण होते है वह भले ही दिखावा मात्र होता है लेकिन बाबा साहेब आंबेडकर के बताए मार्ग सिद्धांत पर कोई नही चलता है।अंधविश्वास पाखंडी कर्मकांड परम्पराओ मेंअपनायें स्वार्थी और अतिमहत्वाकांक्षी बने हुए है। देश में बौद्धिक सैद्धांतिक विचारधारा का संविधान लागू है फिर भी जाति भेदभाव चरम पर है। ऐसा लगता है कि संविधान का राज व्यवस्था नही ब्राह्मणी मनु व्यवस्था चल रही है धर्म के नाम हिंदू मुस्लिम साम्प्रदायिकता दंगे हो रहे है।धर्म के नाम पर बांटा जा रहा है। जाति के नाम पर अमानवीय व्यवहार केवल  सनातन हिंदू सिर्फ वोटों तक सीमित है फिर शुद्र नीच अछुत कहकर गांव से घोड़ी पर बैठ कर चल नहीं सकते, मंदिर में भगवान के दर्शन पुजा पाठ नही कर भेदभाव होता है।मृत शरीर को श्मशान घाट में जलाया नही दिया जाता है धर्म और आस्था के नाम पर हिंदू मुस्लिम मारपीट किया जाता है, अराजकता फैलाई जा रही है।गलत परंपरा की जांच परखने के बजाय माना जा रहा है।वास्तविकता यह है कि डॉ बाबा साहेब आंबेडकर को मनना और सिध्दांत मार्ग चलना औपचारिकता दिखावा भर रह गया है। शुद्र दलित बहुजन समाज जयभीम बोलो किधर भी चल रहे है। जिन ब्राह्मणी मनु विचारधारा से दुर रहने के लिए सतर्क किया था। उसी विचारधारा में दिख रहे है। मनुवादी विचारधारा वाले स्वार्थी धोखेबाज है।सामाजिक रिस्तेदारी प्रतिनिधित्व के भय से सम्पर्क परिस्थिति में जातिगत भेदभाव जड़ से खत्म होने के बजाय जातिगत भेदभाव सरकारी रोजगार शिक्षा खत्म कर दी है।अराजकता फैलाने वालों का शासन मजबूत हो रहा है। लोकतांत्रिक संविधान खतरे में है

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