मनुस्मृति का दहनःअन्याय, असमानता और दासता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को प्रत्यक्ष चुनौती
मनुस्मृति का दहनः अन्याय, असमानता और दासता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को प्रत्यक्ष चुनौती
मनुस्मृति दहन दिवस!!! 25 दिसंबर 1927 को, डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन करके अन्याय, असमानता और दासता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को प्रत्यक्ष चुनौती दी। मनुस्मृति कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं थी, बल्कि यह भेदभाव का प्रतीक थी, जो महिलाओं को दासता में धकेलती थी और शोषण को जन्म देती थी। बाबासाहेब ने इसे जलाकर समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का मार्ग दिखाया। मनुस्मृति दहन केवल एक पुस्तक के विरुद्ध विरोध नहीं था। यह न्याय और मानवीय गरिमा पर आधारित समाज के निर्माण की शुरुआत थी। वंचित बहुजन अघाड़ी आज भी बाबासाहेब के क्रांतिकारी विचारों की नींव पर खड़ी है। हमारा संकल्प अन्यायपूर्ण विचारों का विरोध करना और लोकतंत्र को मजबूत करना है। मनुस्मृति का दहन करके बाबासाहेब ने महिलाओं को दासता से मुक्त किया।
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