आम्बेडकरी समाज वोट है लेकिन सत्ता नही -?

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अंबेडकरी समाज वोट तो हैं, लेकिन सत्ता नहीं –?

✍🏻वकील आर्यन बौड: 9930675999 (मुंबई उच्च न्यायालय)

आज, अगर हम मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई नगर निगमों पर नज़र डालें, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है – अंबेडकरी समाज के वोट तो भारी हैं, लेकिन सत्ता शून्य है। यह सवाल कोई संयोग नहीं है, बल्कि हमारी राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक विफलता का नतीजा है। अंबेडकरी समाज कई शहरों में बसा हुआ है। स्वतंत्र कॉलोनियों, झुग्गी-झोपड़ियों, चॉलों और बड़े निर्वाचन क्षेत्रों में निर्णायक वोट शक्ति होने के बावजूद, एक भी अंबेडकरी पार्षद, विधायक या प्रभावी प्रतिनिधि निर्वाचित नहीं होता। इस मामले पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। *”सत्ता दूसरों के हाथ में क्यों जाती है?”* भाजपा, शिवसेना (शिंदे समूह), कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी या कुछ जगहों पर एएमआईएम जैसी पार्टियां हमारी बस्तियों से चुनी जाती हैं। ये पार्टियां चुनाव के दौरान हमारे दरवाजे पर आती हैं, वादे करती हैं, कुछ अस्थायी सुविधाएं देती हैं और चुने जाने के बाद अंबेडकरवादी समुदाय के बुनियादी मुद्दे उपेक्षित रह जाते हैं।
शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, आवास, सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कोई ठोस काम नहीं होता। इसके विपरीत: समाज को आश्रित रखा जाता है और शिक्षा के बजाय भावनात्मक मुद्दों में निवेश किया जाता है, युवा बेरोजगार रहते हैं, महिलाएं आर्थिक रूप से असुरक्षित रहती हैं। यह स्थिति आकस्मिक नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीति का हिस्सा है। असली समस्या बाहर नहीं, बल्कि अंदर है। हम हमेशा राजनीतिक दलों को दोष देते हैं, लेकिन असली समस्या हमारे भीतर है! हम अपने योग्य उम्मीदवारों को मैदान में नहीं उतारते, संगठित होने के बजाय गुट बनाते हैं, अस्थायी लाभ के लिए दीर्घकालिक नुकसान स्वीकार करते हैं, मतदान करते समय बिना सोचे-समझे यह तय करते हैं कि किसे देना है। इसका परिणाम यह है कि हमारे वोट तो इस्तेमाल होते हैं, लेकिन सत्ता दूसरों के हाथ में चली जाती है। *“सत्ता क्यों महत्वपूर्ण है?”* सत्ता सिर्फ एक कुर्सी नहीं है। सत्ता का अर्थ है: विकास निधि का अधिकार! निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी! हमारी बस्तियों की सुरक्षा! अगली पीढ़ी का भविष्य! सुरक्षा की शक्ति! यदि सत्ता नहीं है, तो संवैधानिक अधिकार भी कागजों पर ही रह जाते हैं। *“अब क्या किया जाना चाहिए?”* यदि “वोट तो हैं, लेकिन सत्ता नहीं” की स्थिति को बदलना है, तो निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं। 1) स्व-संगठन: जाति, धर्म, समूह को भुलाकर एकजुट होना। 2) शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता: समाज द्वारा स्वयं अध्ययन कक्ष, पुस्तकालय, प्रतियोगी परीक्षा मार्गदर्शन केंद्र स्थापित करना। 3) वित्तीय आत्मनिर्भरता: सामुदायिक निधियों, सहकारी संस्थाओं, लघु उद्योगों को समर्थन देना। 4) स्वयं का नेतृत्व तैयार करना: शिक्षित, चरित्रवान और समाज से जुड़े उम्मीदवारों को खड़ा करना। 5) सार्थक मतदान: भीख मांगने, लालच देने, भावनात्मक नारों को नकारते हुए, नीतिगत आधार पर मतदान करना। डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने संविधान दिया, अधिकार दिए, मार्ग दिखाया। लेकिन सत्ता के लिए संघर्ष करने की जिम्मेदारी उन्होंने हमें सौंपी।”* जब तक अंबेडकर समुदाय अपना नेतृत्व स्वयं नहीं बनाता, अपनी नीतियां स्वयं तय नहीं करता और अपनी शक्ति स्वयं नहीं सृजित नहीं करता, तब तक “वोट तो हैं, लेकिन सत्ता नहीं” की वास्तविकता नहीं बदलेगी। अब चुनाव हमारा है – केवल मतदाता बनकर जीना या शासक बनकर खड़े होना।

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