*महिलाएँ अपनी सोच से अपना साम्राज्य बदल सकती हैं; जरूरत है अवसर पैदा करने की.*

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*अपनी बात*

*महिलाएँ अपनी सोच से अपना साम्राज्य बदल सकती हैं; जरूरत है अवसर पैदा करने की.*

देश के संविधान में स्वतंत्रता, धर्म निरपेक्षता और लोकतांत्रिक राजकीय व्यवस्था बाबासाहब की देन है। जिन्होंने संविधान का ढाॅंचा ही इस तरह तैयार किया है कि कट्टर उच्चवर्गीय जातियाॅं भी इसे मानने को विवश है। तात्पर्य यह है कि देश में इससे अच्छा कोई विधान हो ही नहीं सकता। इस काॅलम में मैं महिलाओं की पैरवी कर रही हॅूं कि वे अपने विचारधारा को खुला रखें, चाहे वे गृहणी हो, उच्चशिक्षित या नौकरी पेशा। अस्तित्व सबका है; अनपढ़ से अनपढ़ महिला भी अपने श्रम से परिवार के लिए कुछ पैसा जुटाती है तो उसका उतना ही सम्मान जितना एक नौकरी कर रही महिला का। अब वक्त आ गया है हमारी महिलायें हर क्षेत्र मेें आगे बढ़े। टीव्ही सीरियलों, किट्टी पार्टी से बाहर निकलें, बाहर की दुनिया देखें। अपने बच्चों को बाबासाहब और तथागत् बुद्ध के साहित्य से परिचित करायें। हमारे समाज की कुलीन महिलाओं को चाहिए कि अगर वह किट्टी पार्टी करती है या अंजुमन चलाती है; उसमें से 5 प्रतिशत किसी उद्योग के लिए सुरक्षित रखें और 10-20 नौकरी पेशा महिलायें मिलकर एक छोटा सा उद्योग या NGO चलाने का प्रयास करें अथवा किसी और महिलाओं से इसे चलाने का विचार करे क्योंकि वे पापड़, अचार, मसाले, टिफिन सेंटर, सिलाई, बुटिक चलाकर अपना औद्योगिक साम्राज्य स्थापित कर सकती है और समाज में सम्मान पा सकती है। ज्यादातर महिलायें सरकारी नौकरी से ऊपर नहीं सोच पाती। हमारे ही सामाजिक संगठन सरकार की कई योजनाओं को ऐसी महिलाओं तक पहॅुचाने में भी नाकाम है। वे केवल नाम के संगठन है। इन संगठनों द्वारा महिलाओं को एक मंच पर लाकर इनका अस्तित्व बनाया जा सकता है लेकिन इस दिशा में कभी पहल ही नहीं हुई। हमारे जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। कुछ घटनायें हमें स्थायी रूप से अपंग बना देती है। जिससे घर-परिवार संकट में आ जाता है। जिस समाज में हम गर्व से जी रहें हैं, हमारे लिए यह याद रखने योग्य है कि उस जमाने में बाबासाहब ने एक ब्रेड खाकर, रातभर जागकर हमारे समाज के लिए बेहतर जीवन की कल्पना कैसे की होगी। उसका आनन्द हम ले रहे हैं लेकिन अच्छे पद और स्तर पाने के बाद हमने कभी अपने समाज की ओर मुड़कर देखा तक नहीं। यहाॅं हमें डार्विन का विकासवादी सिद्धांत याद रखना होगा कि जो संघर्ष नहीं करते वे समाप्त हो जाते हैं। बाबासाहब ने अभावों के बीच स्वयं को स्थापित रखा और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित किया। हमें अपने बच्चों को पारम्परिक व्यवसाय छोड़कर आधुनिक एवं समय की मांग के अनुरूप व्यवसाय चुनने की सोच पैदा करनी होगी। हमें यह साबित करना होगा कि व्यक्ति जन्म से ही कुछ नहीं होता, कर्म से बनता है। उच्च वर्ण की इसी सोच को हमें बदलना है। जब हमारे बच्चे अच्छे तकनीकी कौशल और आधुनिक सोच के साथ अन्य वर्गो के बीच होड़ में अग्रसर होंगे तो बाबासाहब और भगवान बुद्ध का धम्म अपने आप ब्रह्माण्ड में कमल की तरह खिलकर ऊभर आयेगा। हर व्यक्ति में कुछ न कुछ गुप्त मानवीय गुण एवं प्रतिभायें होती हैं जरूरत है उसे अवसर मिलने की। जहाॅं चाह है वहाॅं राह है।

लेखिका महिला विषयों की चिंतक है।          JTC BETUL

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