महाबोधि महाविहार बौद्ध गया मुक्ति आंदोलन संविधान के अनुरूप फिर भी दिक्कते ?

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महाबोधि महाविहार बौद्ध गया मुक्ति आंदोलन संविधान के अनुरूप फिर भी दिक्कते ?

बौद्ध गया में महाबोधि महाविहार की स्थापना 250 ई पुर्व सम्राट अशोक ने तीसरी बौद्ध संगीती की याद बनवाया और आज प्राचीनतम बुद्ध विहार के नाम से प्रसिद्ध है लेकिन 1949 एक्ट से महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्धो के हाथों में नही है ब्राह्मणो पुरोहितो के हाथों संचालित हो रहा है। जिससे महाबोधि महाविहार मंदिर परिसर अगाहे बगाहे अंधश्रद्धा मुड़न संस्कार गतिविधियां होती रहती है। इस तरह के संस्कारों ने बौद्ध धर्म के संस्कारो को ही बदल दिया है। बौद्ध धर्म हमें मानवतावादी इंसानियत और समानता ज्ञान व्यवहार में अपनाने के लिए हमें बुद्धि विवेक चेतना प्रज्ञा की शरण जाने के लिए प्रेरित करता है।जब तक हम बुद्धिवादी चेतनावादी को नही अपनाएंगे तब तक हमें दुःखो से छुटकारा नही मिल सकता प्रकृतिवादी धर्म है। इसमें अंधविश्वास कर्मकांड आत्मा परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं है, जीवन सत्यवादी सरल कल्याणकारी मार्ग है। जिनेवा में अंतराष्ट्रीय धर्म सम्मेलन में धार्मिक और आध्यात्मिक प्रगति के लिए बौद्ध धर्म को सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। राष्ट्र की प्रगति और विकास के लिए बौद्ध धर्म की नीति गतिविधियां महत्वपूर्ण है।समानता और एकता नैतिकता का पहला गुण होना चाहिए लेकिन यहां हिंदू मुस्लिम सम्प्रदाय पर जोर दिया जा रहा है। और शासक भी वही बन रहे है गुणवत्ताकारी शिक्षा पर ध्यान पढ़ाई नही जा रही साक्षरता पर जोर दिया जा रहा है।शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है।ऐसी स्थिति में देश विश्व गुरु कैसे बन सकता है। सार्वजनिक मंच से ब्रह्मा विष्णु महेश को ईश्वर नही मानेंगे शपथ के साथ धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है वहीं विश्व स्तर पर बौद्धो की संख्या कम और कमजोर दिख रही है।महाबोधि महाविहार बौद्ध गया का मुक्ति आंदोलन 133 दिवस विश्व स्तर का हो गया लेकिन आंदोलन का परिणाम शुन्य ही दिख रहा शर्मनाक है इससे साबित होता है कि आम्बेडकरी बौद्धिष्टो में दम नही है।

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