*20 दिनों में 26 बीएलओ (BLO) की मौत!* ये मौत नहीं बल्कि एसआईआर (SIR) के दवाब में होने वाली हत्याएँ हैं!

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*20 दिनों में 26 बीएलओ (BLO) की मौत!*

ये मौत नहीं बल्कि एसआईआर (SIR) के दवाब में होने वाली हत्याएँ हैं!

✍️ दिल्ली स्टेट आंगनवाड़ी वर्कर्स एंड हेल्पर यूनियन द्वारा जारी।

एसआईआर यानी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) के ज़रिये भाजपा सरकार द्वारा चुनाव में फर्ज़ीवाड़े की ख़बर से देशभर में लोग पहले ही परिचित थे। पिछले कुछ दिनों में इसकी भयावहता और खुल कर सामने आयी जब यह पता चला कि यह फर्ज़ीवाड़ा लोगों की मौत का कारण बन गया है। एसआईआर करने के दवाब की वज़ह से सिर्फ़ पिछले 20 दिनों में 26 बीएलओ की मौत हो चुकी है। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल से लेकर केरल, तमिलनाडु से यह ख़बर आनी शुरु हो गयी है कि एसआईआर को ज़मीनी स्तर पर करने वाले लोग यानी आँगनवाड़ीकर्मी या प्राइमरी स्कूल के शिक्षक किस भयानक मानसिक दवाब से गुज़र रहें हैं।

 

हालिया ख़बर है कि गुजरात में मतदाता सूचियों के एसआईआर के दौरान 250 प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों ने 27 नवम्बर को अहमदाबाद के खोखरा स्थित एक डेटा अपलोडिंग सेण्टर पर बढ़ते वर्कलोड से परेशान होकर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया है। उनकी मुख्य माँग है कि काम के दवाब को कम किया जाये, सर्वर व एप्लिकेशन की समस्या का समाधान किया जाये और एफआईआर व केस की धमकी देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाये।

वहीं उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक एसआईआर सुपरवाइजर से ख़ुदकुशी कर ली क्योंकि उसके ऊपर काम का अत्यधिक बोझ था। विपिन यादव नाम के इस सुपरवाइजर के परिवार वालों ने बताया कि उनपर लगातार अधिकारियों द्वारा इस बात का दवाब बनाया जा रहा था कि वे मतदाता सूची से कुछ नामों को हटाकर उनकी जगह फ़र्ज़ी नाम जोड़े, जिससे मना करने पर उन्हें लगातार डराया-धमकाया जा रहा था इसलिए अन्ततः परेशान होकर विपिन ने अपनी जान ले ली। 

ठीक ऐसी ही एक घटना उत्तरप्रदेश के फतेहपुर से आयी है जहाँ 25 वर्षीय एक नौजवान ने अपनी शादी से एक दिन पहले आत्महत्या कर ली और अपनी आत्महत्या का कारण काम का अत्यधिक दवाब बताया। सुधीर कुमार नाम का यह युवक दलित परिवार से आता था जिसे काफ़ी मुश्किलें झेलने के बाद 2024 में सरकारी क्लर्क की नौकरी मिली थी। 25 नवम्बर को सुधीर की शादी तय थी जिसकी तैयारी के लिये वह लम्बे समय से छुट्टी के आवदेन दे रहा था मगर उसकी छुट्टी हर बार खारिज़ कर दी जा रही थी।

23 नवम्बर यानी रविवार को एसआईआर के सम्बन्ध में किसी “आधिकारिक मीटिंग” में ना शामिल रह पाने की वज़ह से सुधीर को सस्पेंड कर दिया गया जिसकी सूचना मिलने पर वह टूट गया और आख़िर में उसने अपनी जान ले ली। पश्चिम बंगाल में भी एक महिला बीएलओ ने ख़ुद को फाँसी लगा ली और अपने सुसाइड नोट में यह लिखा कि वो एसआईआर से सम्बन्धित काम के दवाब को झेल पाने में असमर्थ है।

 

भाजपा-शासित राज्यों में यह आँकड़ा सबसे अधिक है। मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तरप्रदेश में बीएलओज़ (BLOs) के काम की स्थिति बेहद अमानवीय है। कोई हार्टअटैक से मर रहा है तो किसी का ब्रेन हैमरेज हो रहा है और कुछ लोग तो अपनी जान लेने पर ही मजबूर हो रहें हैं।

देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है जब बीएलओज़ पर FIR किये जा रहें हैं। नोएडा में 60 बीएलओ पर काम पूरा न करने का कारण बताते हुए केस दर्ज़ हुए हैं जिसमें अधिकांश या तो आँगनवाड़ी की महिलाएँ हैं या फिर प्राइमरी स्कूल के शिक्षक जो पहले ही अपने विभाग के काम के बोझ तले दबे होते हैं। किसी भी BLO को एक मतदाता के वेरिफिकेशन के लिये उसके पास कम से कम तीन बार जाना पड़ता है और एक बीएलओ के ऊपर 1000 से अधिक जनसंख्या के वेरिफिकेशन की ज़िम्मेदारी होती है। ऐसे में, अगर मतदाता कार्यदिवस पर नहीं मिलता है तो छुट्टी वाले दिन भी उन्हें सुबह से शाम तक काम करना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ़ इस पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन करने में दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है और कई बार तो तकनीकी दिक़्क़तों की वज़ह से काम समय पर पूरा नहीं होता है।

लेकिन इन सभी परेशानियों को अनदेखा करते हुए इस बीच भाजपा सरकार जिस हड़बड़ी में एसआईआर करवा रही है उससे कई सवाल हमारे सामने खड़े होते हैं!

 

जैसे क्या है एसआईआर? आख़िर क्यों इतनी जल्दबाज़ी में यह करवाया जा रहा है? इसके पीछे भाजपा सरकार की मंशा क्या है? इससे किसका भला होगा? और बेहिसाब काम के दवाब में हो रही इन मौतों का ज़िम्मेदार कौन है?

 

सीधे तौर पर समझे तो एसआईआर भाजपा सरकार द्वारा शुरू किया गया नया घोटाला है जिसके पीछे इनकी मंशा यही है कि चुनाव की समूची प्रणाली को ही बेअसर बना दिया जाये। यानी जनता की सामूहिक इच्छा चाहे कुछ भी हो, वह चुनावों की प्रक्रिया में सटीकता के साथ प्रकट ही न हो पाये और भाजपा सत्ता में बरक़रार रहे। इसलिए ही इसको हर जगह लागू करने को लेकर मोदी सरकार इतनी हड़बड़ी में है। ऐसी चुस्ती और मुस्तैदी जनता के ज़रूरी मुद्दों यानी शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, बढ़ते प्रदूषण इत्यादि के सवाल पर कभी नहीं दिखायी देती है।

 बिहार में हुए एसआईआर का उदाहरण हमारे सामने है।

एसआईआर के ज़रिये भाजपा सरकार ने बिहार की जनता के उन हिस्सों के मताधिकार को छीनने की साज़िश की है, जो हिस्से ग़रीब दलित, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों और प्रवासी मज़दूरों के बीच से आते हैं यानी उन जगहों से जहाँ से भाजपा को वोट मिलने की उम्मीद नगण्य है।

 

एसआईआर से भाजपाइयों के अलावा किसी का भला नहीं होने वाला है। यह वास्तव में समूची जनता के ख़िलाफ़ है। “घुसपैठियों” का नक़ली डर दिखाकर वास्तव में सभी धर्मों व जातियों की आम मेहनतकश जनता को निशाना बनाया जा रहा है। निश्चित तौर पर, इसके ज़रिये सबसे ज़्यादा आम मुस्लिम आबादी के विरुद्ध ज़हरीला माहौल बनाया जा रहा है ताकि बेरोज़गारी और महँगाई से त्रस्त जनता का गुस्सा एक नक़ली दुश्मन पर फूट जाये और मोदी सरकार को कठघरे से बाहर कर जनता आपस में ही लड़ती रहे। 

जहाँ कहीं मोदी सरकार इसे लागू करने का प्रयास कर रही है वहाँ हमें सबसे पहले तो सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करना चाहिए। 

इसके साथ ही एसआईआर के फर्ज़ीवाड़े के आड़ में हो रही हत्याओं के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठानी होगी। पिछले कुछ दिनों में एसआईआर के दवाब और मानसिक प्रताड़ना से होने वाली मौतों की संख्या जिस तरह बढ़ती जा रही है, वह असहनीय है। लोगों की इन असामयिक मौत की ज़िम्मेदार भाजपा सरकार और उसकी फ़र्ज़ी नीतियाँ हैं। इसके ख़िलाफ़ अगर हम अब भी चुप रहें तो कल जब हमारी बारी आयेगी तो बोलने के लिये कोई नहीं बचेगा।

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