खून बेचकर शिक्षा – सपनों की कीमत लेखक : निर्मल दास मानकर मो.7354089988

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खून बेचकर शिक्षा – सपनों की कीमत

लेखक : निर्मल दास मानकर

मो.7354089988

उतरप्रदेश के

प्रयागराज( इलाहाबाद) मेडिकल एसोसिएशन (AMA) ब्लड बैंक और कोचिंग सेंटरों के आसपास दलालों (सोनू, राजेश आदि) का एक नेटवर्क सक्रिय है। ये दलाल हॉस्टलों में रह रहे आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को निशाना बनाते हैं।

• फर्जी दस्तावेज: दलाल मरीजों के नाम पर अस्पतालों के नकली डिमांड लेटर और फर्जी मेडिकल पर्चियों व स्टैम्प का इस्तेमाल कर ब्लड बैंक में सेटिंग करते हैं।
• पैसों की लूट: दलाल मरीजों के तीमारदारों से प्रति यूनिट खून के लगभग ₹8,000 तक वसूलते हैं, लेकिन जरूरतमंद छात्रों को कमीशन काटकर केवल ₹3,000 से ₹4,000 ही देते हैं।

📉 छात्रों की मजबूरी और भारी खर्च

• महंगी शिक्षा: प्रयागराज के विभिन्न संस्थानों में सालाना कोचिंग फीस ₹1.20 लाख से ₹1.80 लाख तक है। इसके अलावा रहने और खाने का खर्च अलग से होता है।
• पारिवारिक कर्ज: इस रैकेट में फंसे अधिकांश छात्र गरीब किसान परिवारों से हैं, जिनके माता-पिता पहले से ही जमीन गिरवी रखकर या भारी कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसे भेज रहे हैं।
• अंतिम उपाय: हॉस्टल का किराया न चुका पाने और पढ़ाई बीच में छूटने के डर से छात्रों ने इस अवैध रास्ते को चुना। एक छात्र का कहना था कि—”खून तो शरीर में दोबारा बन जाएगा, लेकिन पढ़ाई का मौका दोबारा नहीं आएगा।” शिक्षा के खर्चा की पुर्ती के लिए छात्राओं का खुन बेचने का शर्मिंदगी की घटना की काहनी है?

🩺 सेहत पर गंभीर खतरा

उतरप्प्रदेश प्रयागराज  मे सुबह हमेशा की तरह अपने साथ हजारों सपने लेकर आई थी। शहर की गलियों में कहीं चाय की दुकानों पर प्रतियोगी परीक्षाओं की चर्चा हो रही थी, तो कहीं कोचिंग संस्थानों के बाहर विद्यार्थियों की लंबी कतारें लगी थीं। किसी के हाथ में NEET की किताब थी, तो कोई SSC और UPSC की तैयारी में जुटा हुआ था।

इन विद्यार्थियों की आँखों में एक ही सपना था—पढ़-लिखकर अपने परिवार की गरीबी दूर करना, माता-पिता को सम्मानजनक जीवन देना और समाज में अपनी पहचान बनाना।

लेकिन इन सपनों के पीछे छिपा संघर्ष बहुत कम लोगों को दिखाई देता था।

इन्हीं हजारों विद्यार्थियों में एक था रवि।

रवि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के किसान परिवार से प्रयागराज पढ़ने आया था। उसके पिता के पास केवल दो बीघा जमीन थी। उसी जमीन से परिवार का साल भर का खर्च, खेती का कर्ज और बच्चों की पढ़ाई चलती थी।

रवि पढ़ने में होशियार था। गाँव के सरकारी स्कूल से बारहवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण करने के बाद उसने NEET की तैयारी करने का फैसला किया था।

पिता ने बेटे के सपनों को पूरा करने के लिए खेत गिरवी रख दिया था।

जब रवि प्रयागराज आया था, तब पिता ने स्टेशन पर विदा करते समय उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा था—

“बेटा, हमारे पास तुम्हें देने के लिए ज्यादा धन नहीं है। बस इतनी जमीन है। हमने उसे भी तुम्हारी पढ़ाई के लिए दाँव पर लगा दिया है। तुम मन लगाकर पढ़ना। एक दिन डॉक्टर बनकर गाँव का नाम रोशन करना।”

रवि की आँखें भर आई थीं।

उसने पिता के पैर छूकर कहा था, “बाबूजी, मैं आपका सपना जरूर पूरा करूँगा।”

शुरुआत के कुछ महीने अच्छे बीते। लेकिन धीरे-धीरे कोचिंग की फीस, हॉस्टल का किराया, मेस का बिल और किताबों का खर्च बढ़ता चला गया।

पिता हर महीने पैसे भेजने की कोशिश करते, लेकिन खेती की आमदनी इतनी नहीं थी कि बेटे की सभी जरूरतें पूरी कर सकें।

एक दिन हॉस्टल के मालिक ने रवि को बुलाया।

“रवि, तुम्हारे दो महीने का किराया बाकी है। मकान चलाना है, तो पैसे भी चाहिए। अब और इंतजार नहीं कर सकता।”

रवि ने हाथ जोड़कर कहा, “सर, कुछ दिन और दे दीजिए। घर से पैसे आते ही जमा कर दूँगा।”

मालिक ने नाराजगी से कहा, “तुम्हारी मजबूरी समझता हूँ, लेकिन मुझे भी अपना हिसाब रखना पड़ता है।”

रवि चुपचाप कमरे में लौट आया।

उस रात उसने खाना नहीं खाया। किताब खुली हुई थी, लेकिन आँखों के सामने शब्दों की जगह पिता का चेहरा घूम रहा था।

उसी कमरे में रहने वाला उसका मित्र आनंद SSC की तैयारी कर रहा था। उसने रवि की परेशानी समझी।

आनंद ने कहा, “रवि, तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं तो कुछ दिनों के लिए कोई काम कर लो।”

रवि बोला, “काम करने से पढ़ाई का समय नहीं मिलेगा। वैसे भी अगली परीक्षा का प्रयास मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।”

आनंद ने धीरे से कहा, “एक और रास्ता है, लेकिन मुझे खुद उस रास्ते पर जाने में शर्म आती है।”

रवि ने पूछा, “कैसा रास्ता?”

आनंद कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “कुछ लोग ब्लड बैंक के आसपास विद्यार्थियों से पैसे देकर खून लेने की बात करते हैं। मैंने भी अपनी मेस का बिल चुकाने के लिए ऐसा किया है।”

रवि के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“क्या? तुमने अपना खून बेचा?”

आनंद ने नजरें झुका लीं।

“क्या करूँ रवि? घर से पैसे माँगने की हिम्मत नहीं होती। पिता पहले ही कर्ज में हैं। सोचा, शरीर में खून फिर बन जाएगा, लेकिन पढ़ाई का मौका दोबारा नहीं मिलेगा।”

रवि के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था।

कुछ दिनों बाद रवि भी आर्थिक परेशानी के कारण उसी रास्ते पर जाने के बारे में सोचने लगा।

उस दिन वह राजापुर चौराहे के आसपास पहुँचा। वहाँ एक व्यक्ति ने उससे पूछा—

“पढ़ाई करते हो?”

“जी, NEET की तैयारी कर रहा हूँ।”

“पैसों की जरूरत है?”

रवि ने चुपचाप सिर हिला दिया।

उस व्यक्ति ने कहा, “अगर जरूरत है तो इंतजाम हो सकता है।”

रवि कुछ क्षण के लिए ठहर गया। उसे लगा जैसे उसके सपनों और आत्मसम्मान के बीच कोई खाई खड़ी हो गई हो।

उसके मन में पिता की आवाज गूँजने लगी—

“बेटा, तुम्हें डॉक्टर बनना है।”

उसने सोचा, जिस शरीर से डॉक्टर बनकर लोगों की जान बचानी है, उसी शरीर का खून बेचकर मैं अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाऊँगा?

उसकी आँखें नम हो गईं।

वह बिना कुछ बोले वहाँ से लौट आया।

अगले दिन उसने अपने पिता को फोन किया।

“बाबूजी, मुझे आपसे कुछ कहना है।”

“हाँ बेटा, बोलो। सब ठीक तो है?”

“बाबूजी, मेरी फीस बाकी है। हॉस्टल का किराया भी नहीं दे पाया हूँ। किताबें खरीदने के पैसे भी नहीं हैं।”

पिता कुछ देर शांत रहे।

फिर बोले, “बेटा, इस बार फसल अच्छी नहीं हुई। साहूकार का कर्ज भी देना है। तुम्हारी माँ के गहने भी पहले ही गिरवी रख दिए हैं। मैं कोशिश कर रहा हूँ।”

रवि ने काँपती आवाज में पूछा, “बाबूजी, अगर मैं पढ़ाई छोड़कर गाँव लौट आऊँ तो?”

पिता की आवाज अचानक भारी हो गई।

“नहीं बेटा! ऐसा मत कहना। हमने गरीबी देखी है। तुम्हें वही जिंदगी नहीं जीने देना चाहते। अगर आज तुम्हारी पढ़ाई रुक गई तो हमारा सपना भी टूट जाएगा।”

फोन कट गया।

रवि देर तक मोबाइल हाथ में लेकर बैठा रहा।

उस रात उसने अपने मित्र आनंद को सारी बात बताई।

आनंद बोला, “रवि, हमें अपनी मजबूरी छिपाने के बजाय किसी ऐसे व्यक्ति से बात करनी चाहिए जो हमारी सहायता कर सके।”

अगले दिन दोनों ने अपने कोचिंग संस्थान के एक शिक्षक से मुलाकात की। उन्होंने अपनी आर्थिक परेशानी बताई और फीस में राहत माँगी।

शिक्षक उनकी बात सुनकर गंभीर हो गए।

उन्होंने कहा, “तुम दोनों ने अपनी परेशानी बताने में इतनी देर क्यों लगा दी? शिक्षा का उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाना भी है। यदि आर्थिक अभाव में प्रतिभाशाली विद्यार्थी पढ़ाई छोड़ दें तो यह हम सबकी विफलता है।”

उन्होंने संस्थान के प्रबंधन से बात की और कुछ समय के लिए फीस में राहत दिलवाई। साथ ही विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति और आर्थिक सहायता की उपलब्ध योजनाओं की जानकारी जुटाने में मदद की।

लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

कुछ दिनों बाद रवि को समाचार मिला कि कई विद्यार्थी अपनी पढ़ाई और हॉस्टल का खर्च उठाने के लिए पैसे लेकर रक्त देने की बात स्वीकार कर रहे हैं।

वह समाचार पढ़कर स्तब्ध रह गया।

उसे अपना संघर्ष याद आया। उसे आनंद का चेहरा याद आया। उसे वे तमाम विद्यार्थी याद आए जो अपने माता-पिता की उम्मीदों को बचाने के लिए खुद के स्वास्थ्य को जोखिम में डाल रहे थे।

उसने अपने शिक्षक से पूछा—

“सर, क्या हमारे देश में शिक्षा इतनी महँगी हो गई है कि गरीब विद्यार्थी को पढ़ने के लिए अपना खून तक बेचना पड़े?”

शिक्षक के पास भी इस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं था।

उन्होंने कहा, “बेटा, किसी भी समाज की असली प्रगति तब होती है, जब वहाँ गरीब का बच्चा भी बिना भय और आर्थिक दबाव के शिक्षा प्राप्त कर सके। केवल स्कूल और कॉलेज खोल देना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा हर जरूरतमंद तक पहुँचना भी जरूरी है।”

रवि ने उसी दिन निर्णय लिया कि वह अपने जैसे आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की सहायता के लिए आवाज उठाएगा।

उसने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक छोटा-सा विद्यार्थी सहायता समूह बनाया। उन्होंने जरूरतमंद विद्यार्थियों की समस्याओं को लिखना शुरू किया। छात्रवृत्ति, पुस्तक सहायता, फीस में राहत और सस्ती आवास व्यवस्था के लिए संबंधित संस्थाओं को आवेदन दिए।

उन्होंने प्रशासन से भी अनुरोध किया कि आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को समय पर सहायता मिले और रक्त की अवैध खरीद-बिक्री करने वाले बिचौलियों पर कार्रवाई हो।

रवि की आवाज धीरे-धीरे दूसरे विद्यार्थियों तक पहुँचने लगी।

एक दिन उसने अपने साथियों के सामने कहा—

“हम खून बेचकर शिक्षा नहीं खरीदना चाहते। हम शिक्षा प्राप्त करके समाज को जीवन देना चाहते हैं। हमारे माता-पिता ने हमें इसलिए नहीं पढ़ाया कि हम अपनी मजबूरी में अपना स्वास्थ्य दाँव पर लगा दें। उन्होंने हमें इसलिए पढ़ाया है कि हम अपने पैरों पर खड़े हो सकें।”

उसकी बात सुनकर कमरे में बैठे सभी विद्यार्थी भावुक हो गए।

रवि की तैयारी जारी रही। संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ था। आगे कई परीक्षाएँ थीं, कई आर्थिक कठिनाइयाँ थीं और कई अनिश्चितताएँ भी थीं।

लेकिन अब वह अकेला नहीं था।

उसके साथियों ने तय किया था कि किसी भी विद्यार्थी को अपनी आर्थिक मजबूरी के कारण पढ़ाई छोड़ने या स्वास्थ्य को खतरे में डालने की नौबत न आए।

कहानी का संदेश

प्रयागराज की यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसी कौन-सी कमियाँ हैं, जिनके कारण गरीब परिवारों के होनहार बच्चों को पढ़ाई जारी रखने के लिए अपने शरीर का खून तक देने की बात सोचनी पड़ रही है?

क्या शिक्षा केवल उन बच्चों का अधिकार है जिनके माता-पिता महंगी कोचिंग, हॉस्टल और फीस का खर्च उठा सकते हैं?

क्या किसान का बेटा डॉक्टर बनने का सपना नहीं देख सकता?

क्या मजदूर की बेटी अधिकारी नहीं बन सकती?

क्या गरीबी किसी विद्यार्थी की प्रतिभा से बड़ी हो सकती है?

शिक्षा किसी परिवार की आर्थिक हैसियत की मोहताज नहीं होनी चाहिए।

सरकार, शिक्षण संस्थानों, समाजसेवी संगठनों और समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी है कि आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, निःशुल्क या सस्ती शिक्षा, आवास और भोजन की पर्याप्त सहायता मिले।

रक्तदान जीवन बचाने के लिए होता है, शिक्षा का खर्च जुटाने के लिए खून की खरीद-बिक्री का रास्ता नहीं बनना चाहिए।

किसी विद्यार्थी की पहचान उसके खून की कीमत से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा, मेहनत और ज्ञान से होनी चाहिए।

क्योंकि जिस देश का युवा अपने सपनों को बचाने के लिए अपना खून बेचने की सोचने लगे, उस देश को अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करना होगा।

सवाल यह नहीं है कि विद्यार्थी अपना खून क्यों बेच रहे हैं। असली सवाल यह है कि ऐसी नौबत आने से पहले हम उनकी मदद क्यों नहीं कर पाए?

Nirmal Das Mankar
State Co-ordinator
DA-3, NCDHR
Gandhi Bhawan parisar,
Shyamla Hills road, Bhopal (MP)
+91 7354089988
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