अनुसूचित जाति उप योजना मेसालाना एसी /एसटी के लिए विशेष करोडो राशि का बजट आंटित लेकिन परिणाम अपेक्षित नही?

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अनुसूचित जाति उपयोजना मे सालना विशेष करोडो राशि का बजट आवंटित लेकिन परिणाम अपेक्षित नही?

वित्तीय वर्ष 2017-18 में अनुसूचित जाति/जनजाति उपयोजना का विश्लेषण

लेखक — निर्मल दास मानकर
दलित आर्थिक अधिकार आन्दोलन — मध्यप्रदेश
भूमिका
भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना केवल राजनीतिक समानता तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तभी मानी जा सकती है, जब समाज के ऐतिहासिक रूप से वंचित और कमजोर वर्गों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आर्थिक अवसर और सम्मानजनक जीवन के समान अवसर प्राप्त हों। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति भारतीय समाज के ऐसे ही महत्वपूर्ण समुदाय हैं, जिन्होंने लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक असमानताओं का सामना किया है।
इसी पृष्ठभूमि में अनुसूचित जाति उपयोजना (SCSP) और अनुसूचित जनजाति उपयोजना (TSP) की अवधारणा महत्वपूर्ण बनती है। इन उपयोजनाओं का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के विकास के लिए बजट में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों और उनका उपयोग लक्षित समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए किया जाए।
वित्तीय वर्ष 2017-18 के मध्यप्रदेश बजट का अध्ययन करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि सरकार ने कितनी राशि का प्रावधान किया। उससे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उनकी जनसंख्या के अनुपात में कितना बजट अपेक्षित था, कितना आवंटित हुआ, कितना वास्तव में खर्च किया गया और उसका वास्तविक लाभ कितने लोगों तक पहुँचा।
इसी दृष्टिकोण से यह अध्ययन मध्यप्रदेश के वित्तीय वर्ष 2017-18 के SCSP/TSP बजट का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
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अध्ययन के उद्देश्य
इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य हैं—
1. मध्यप्रदेश के कुल बजट में SCSP और TSP के लिए किए गए प्रावधान का अध्ययन करना।
2. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या के अनुपात में अपेक्षित बजट और वास्तविक आवंटन की तुलना करना।
3. विभिन्न विभागों में SC/ST के लिए किए गए बजट प्रावधान का अध्ययन करना।
4. आवंटित राशि के उपयोग, पुनर्विनियोजन तथा लैप्स होने जैसे संभावित प्रश्नों की पहचान करना।
5. बजट प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को सामने लाना।
6. यह जानने का प्रयास करना कि बजट आवंटन का वास्तविक सामाजिक-आर्थिक लाभ लक्षित समुदाय तक किस सीमा तक पहुँचता है।
मध्य प्रदेश में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अनुसूचित जाति उपयोजना (SC Sub-Plan) के तहत 31,192 करोड़ रुपये (कुल बजट का लगभग 17%) का प्रावधान किया गया है। 

  • वर्ष 2026-27 बजट राशि: अनुसूचित जाति उपयोजना हेतु 31,192 करोड़ रुपये। [1]

  • आधिकारिक जानकारी और विस्तृत दस्तावेज: आप PRS India मध्य प्रदेश बजट विश्लेषण पर जाकर बजट की रिपोर्ट और आँकड़े देख सकते हैं। 

 

12 मार्च 2025 — समृद्ध मध्यप्रदेश का बजट वर्ष 2025-26 अनुसूचित जाति के कल्याण का संकल्प पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति हेतु ₹765 करोड़ का प्रावधान अनुसूचित जाति…

अनुवाद किया गया — मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री जगदीश देवड़ा ने 18 फरवरी, 2026 को वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट प्रस्तुत किया। मध्य प्रदेश का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 

12 अग॰ 2026 — इसी को देखते हुए वित्त विभाग ने बजट प्रविधानों और राशि के उपयोग का स्पष्ट उल्लेख करने के निर्देश दिए हैं। प्रदेश में अनुसूचित जाति-जनजाति उपयोजना के लिए निर्धार…

 

1. मध्यप्रदेश का कुल बजट और SC/ST आवंटन
वित्तीय वर्ष 2017-18 में मध्यप्रदेश सरकार का कुल बजट लगभग ₹1,85,564.27 करोड़ था।
आपके उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जाति के लिए ₹16,381.40 करोड़ तथा अनुसूचित जनजाति के लिए ₹25,862.15 करोड़ का प्रावधान किया गया।
तालिका : मध्यप्रदेश बजट 2017-18 में SC/ST आवंटन
मद| राशि (₹ करोड़)| कुल बजट में प्रतिशत
कुल बजट| 1,85,564.27| 100%
अनुसूचित जाति आवंटन| 16,381.40| 8.83%
SC के लिए अपेक्षित राशि| 28,948.03| 15.60%
SC के लिए अंतर| 12,566.63| 6.77%
अनुसूचित जनजाति आवंटन| 25,862.15| 13.94%
ST के लिए अपेक्षित राशि| 39,154.06| 21.10%
ST के लिए अंतर| 13,291.91| 7.16%
उपलब्ध आंकड़ों की तुलना से स्पष्ट होता है कि SC के लिए वास्तविक आवंटन और अपेक्षित राशि के बीच लगभग ₹12,566.63 करोड़ का अंतर दिखाई देता है। इसी प्रकार ST के लिए लगभग ₹13,291.91 करोड़ का अंतर दिखाई देता है।
इस अंतर को केवल बजट की कमी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह सामाजिक न्याय की बजट प्रक्रिया, प्राथमिकताओं और संसाधनों के वितरण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
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2. अनुसूचित जाति उपयोजना का विश्लेषण
वित्तीय वर्ष 2017-18 में अनुसूचित जाति के लिए ₹16,381.40 करोड़ का बजट प्रावधान बताया गया है, जो कुल बजट का लगभग 8.83 प्रतिशत है।
उपलब्ध तुलना के अनुसार अनुसूचित जाति की जनसंख्या के अनुपात में लगभग ₹28,948.03 करोड़ की राशि अपेक्षित मानी गई थी।
इस प्रकार वास्तविक आवंटन और अपेक्षित राशि के बीच लगभग ₹12,566.63 करोड़ का अंतर सामने आता है।
यहां मूल प्रश्न यह है कि यदि SC समुदाय के विकास के लिए जनसंख्या के अनुपात में संसाधन उपलब्ध कराना नीति का उद्देश्य है, तो अपेक्षित और वास्तविक आवंटन के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों रहा?
यह प्रश्न केवल सरकार के बजट आकार से संबंधित नहीं है, बल्कि बजट प्राथमिकताओं से भी जुड़ा हुआ है।
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3. अनुसूचित जनजाति उपयोजना का विश्लेषण
अनुसूचित जनजाति के लिए वित्तीय वर्ष 2017-18 में ₹25,862.15 करोड़ का प्रावधान बताया गया है, जो कुल बजट का लगभग 13.94 प्रतिशत है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार ST की जनसंख्या के अनुपात में लगभग ₹39,154.06 करोड़ की राशि अपेक्षित थी।
इस प्रकार लगभग ₹13,291.91 करोड़ का अंतर दिखाई देता है।
मध्यप्रदेश में आदिवासी आबादी का सामाजिक-आर्थिक विकास लंबे समय से एक महत्वपूर्ण नीति विषय रहा है। ऐसे में बजट में पर्याप्त संसाधनों की उपलब्धता के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि उन संसाधनों का उपयोग आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सिंचाई, सड़क, पेयजल, आजीविका और आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने में प्रभावी रूप से हो।
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4. आवंटन से आगे का सवाल : पैसा वास्तव में खर्च कितना हुआ?
SCSP/TSP के अध्ययन में केवल बजट आवंटन को सफलता का पैमाना मानना उचित नहीं है।
किसी योजना के लिए ₹100 करोड़ का प्रावधान होना और उस राशि का वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँच जाना दो अलग-अलग बातें हैं।
इसलिए अध्ययन की वास्तविक कसौटी होनी चाहिए—
आवंटन → व्यय → परिणाम → लाभार्थी
यदि आवंटित राशि का एक हिस्सा खर्च नहीं होता, दूसरे मद में स्थानांतरित होता है अथवा ऐसी योजनाओं पर खर्च होता है जिनका प्रत्यक्ष लाभ लक्षित SC/ST आबादी को नहीं मिलता, तो बजट प्रावधान अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाता।
इसलिए SCSP/TSP के लिए एक प्रभावी सामाजिक ऑडिट व्यवस्था आवश्यक है, जिसके माध्यम से प्रत्येक वित्तीय वर्ष में यह सार्वजनिक किया जाए कि—
– कितनी राशि आवंटित हुई?
– कितनी राशि जारी हुई?
– कितनी राशि खर्च हुई?
– कितनी राशि बची?
– कितनी राशि अन्य मद में स्थानांतरित हुई?
– कितने वास्तविक लाभार्थियों को इसका लाभ मिला?
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5. विभागवार बजट और जवाबदेही
आपके अध्ययन के अनुसार मध्यप्रदेश के 21 विभागों में अनुसूचित जनजाति के लिए किसी प्रकार का बजट आवंटन नहीं किया गया, जबकि 22 विभागों में अनुसूचित जाति के लिए अलग से बजट प्रावधान नहीं दिखाई देता।
यदि ये आंकड़े मूल बजट दस्तावेजों से प्रमाणित होते हैं, तो यह एक महत्वपूर्ण नीति प्रश्न है।
SC/ST समुदायों का विकास केवल आदिम जाति कल्याण विभाग या सामाजिक न्याय विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, ग्रामीण विकास, कौशल विकास, रोजगार, महिला एवं बाल विकास तथा अन्य क्षेत्रों की योजनाओं में भी लक्षित समुदायों के लिए पर्याप्त प्रावधान आवश्यक हैं।
इसलिए SCSP/TSP को एक अंतर-विभागीय विकास नीति के रूप में देखना आवश्यक है।
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6. आदिम जाति कल्याण विभाग
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2017-18 में आदिम जाति कल्याण विभाग का कुल बजट लगभग ₹4,065.90 करोड़ था।
आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण में विभिन्न मदों में राशि का उल्लेख है।
मांग संख्या 33 — आदिम जाति कल्याण विभाग
प्रमुख मद| राशि (₹ करोड़)
लोक निर्माण कार्य/कार्यालय भवन रख-रखाव| 6.00
प्रारंभिक/राजकीय माध्यमिक शिक्षा| 753.21
माध्यमिक शिक्षा| 923.41
SC कल्याण — निर्देशन एवं प्रशासन| 3.24
ST कल्याण — निर्देशन एवं प्रशासन| 132.90
आर्थिक विकास| 97.17
सार्वजनिक क्षेत्र एवं अन्य उपक्रमों को सहायता| 2.70
शिक्षा| 972.66
ST उपयोजना के लिए विशेष सहायता| 15.00
अन्य व्यय| 138.46
पंचायती राज| 7.02
सामुदायिक विकास| 20.68
ग्रामीण विद्युतीकरण/अन्य व्यय| 90.00
सामान्य शिक्षा पर पूंजीगत व्यय| 100.00
SC/ST एवं पिछड़े वर्ग कल्याण पर पूंजीगत व्यय| 164.00
आर्थिक विकास| 231.44
अन्य व्यय| 408.00
योग| 4,065.90
यहां यह समझना आवश्यक है कि शिक्षा, अधोसंरचना, प्रशासन और आर्थिक विकास—सभी आदिवासी विकास से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए किसी एक मद को देखकर पूरे विभाग की प्राथमिकताओं का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
फिर भी आर्थिक विकास से संबंधित मदों का अलग से विश्लेषण यह जानने के लिए आवश्यक है कि आदिवासी परिवारों की आय, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए वास्तविक निवेश कितना किया गया।
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7. आर्थिक विकास और रोजगार
SC/ST समुदायों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार के लिए केवल कल्याणकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं।
रोजगार, कौशल विकास, स्वरोजगार, उद्यमिता, लघु उद्योग, ग्रामोद्योग तथा बाजार से जुड़ाव आर्थिक सशक्तिकरण के प्रमुख साधन हैं।
आपके उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उद्योग क्षेत्र में ST के लिए लगभग 0.05 प्रतिशत तथा SC के लिए लगभग 0.08 प्रतिशत बजट आवंटन का उल्लेख है।
यदि ये प्रतिशत मूल बजट दस्तावेज से सत्यापित होते हैं, तो औद्योगिक क्षेत्र में SC/ST की भागीदारी और आर्थिक अवसरों पर गंभीर विचार की आवश्यकता सामने आती है।
प्रश्न यह होना चाहिए कि—
क्या SC/ST युवाओं के लिए उद्योग एवं रोजगार की योजनाओं में पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए गए थे?
यदि औद्योगिक विकास की मुख्यधारा में इन समुदायों की भागीदारी कम है, तो बजट में लक्षित निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।
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8. ग्रामोद्योग : एक संभावित आर्थिक विकल्प
आपके आंकड़ों के अनुसार ग्रामोद्योग क्षेत्र में अनुसूचित जाति के लिए लगभग 6.7 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजाति के लिए लगभग 12.47 प्रतिशत बजट आवंटन का उल्लेख किया गया है।
ग्रामोद्योग ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में रोजगार निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है।
लेकिन किसी भी योजना की सफलता केवल आवंटन से निर्धारित नहीं की जा सकती।
यह जानना आवश्यक है कि—
– कितने लोगों को ऋण मिला?
– कितने लोगों ने अपना व्यवसाय शुरू किया?
– कितने व्यवसाय सफल रहे?
– कितने रोजगार पैदा हुए?
– कितने लाभार्थी SC/ST समुदाय से थे?
– महिलाओं की भागीदारी कितनी थी?
– सरकारी सहायता और वास्तविक आय में कितना संबंध बना?
इन सवालों के उत्तर मिलने पर ही ग्रामोद्योग बजट की वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन किया जा सकता है।
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9. बजट पारदर्शिता का प्रश्न
SCSP/TSP के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण विषय बजट दस्तावेजों की पारदर्शिता है।
यदि किसी समुदाय के लिए विशेष बजट निर्धारित किया गया है तो आम नागरिक, सामाजिक संगठन, जनप्रतिनिधि और स्वयं लाभार्थी यह जानने में सक्षम होने चाहिए कि—
किस विभाग ने कितना बजट रखा और किस योजना के लिए रखा?
इसी प्रकार वर्ष समाप्त होने के बाद यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि—
कितना खर्च हुआ और किस उद्देश्य पर खर्च हुआ?
पारदर्शिता का अर्थ केवल बजट प्रकाशित करना नहीं है। बजट, संशोधित अनुमान, वास्तविक व्यय और परिणाम—इन सभी को सरल और सार्वजनिक रूप में उपलब्ध कराना भी पारदर्शिता का हिस्सा है।
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10. SCSP/TSP और सामाजिक न्याय
SCSP/TSP की अवधारणा का अंतिम उद्देश्य केवल सरकारी खातों में राशि दर्ज करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में वास्तविक परिवर्तन लाना है।
इसलिए किसी योजना की सफलता को निम्न संकेतकों से मापा जाना चाहिए—
शिक्षा में वृद्धि
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार
रोजगार में वृद्धि
आय में वृद्धि
भूमि एवं आजीविका सुरक्षा
महिला सशक्तिकरण
युवा कौशल विकास
स्वरोजगार
उद्यमिता
गरीबी में कमी
यदि बजट बढ़ता है लेकिन इन क्षेत्रों में अपेक्षित परिवर्तन नहीं दिखाई देता, तो बजट प्रक्रिया और उसके क्रियान्वयन की पुनः समीक्षा आवश्यक है।
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11. मुख्य Findings
इस अध्ययन से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर निम्न प्रमुख बिंदु सामने आते हैं—
पहला, वित्तीय वर्ष 2017-18 के मध्यप्रदेश बजट में SC और ST के लिए आवंटन तथा उपलब्ध जनसंख्या-आधारित अपेक्षित हिस्सेदारी के बीच उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है।
दूसरा, अनुसूचित जाति के लिए लगभग ₹12,566.63 करोड़ तथा अनुसूचित जनजाति के लिए लगभग ₹13,291.91 करोड़ के अंतर का प्रश्न सामने आता है।
तीसरा, केवल बजट आवंटन से सामाजिक न्याय सुनिश्चित नहीं होता। वास्तविक व्यय और लाभार्थियों तक पहुँच की जानकारी भी आवश्यक है।
चौथा, विभागवार बजट में SC/ST के लिए पर्याप्त और स्पष्ट प्रावधान न होने का प्रश्न नीति की समावेशिता से जुड़ा है।
पांचवां, आर्थिक विकास, रोजगार और उद्यमिता के क्षेत्र में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता दिखाई देती है।
छठा, SCSP/TSP के प्रभाव का मूल्यांकन केवल वित्तीय आंकड़ों से नहीं, बल्कि वास्तविक सामाजिक परिणामों से किया जाना चाहिए।
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12. प्रमुख सवाल
इस अध्ययन से कुछ बुनियादी सवाल सामने आते हैं—
1. SC/ST की जनसंख्या के अनुपात में बजट आवंटन क्यों नहीं हुआ?
2. आवंटित राशि में से वास्तविक व्यय कितना हुआ?
3. क्या आवंटित राशि का कोई हिस्सा दूसरे मदों में स्थानांतरित हुआ?
4. यदि राशि खर्च नहीं हुई तो उसका कारण क्या था?
5. किन विभागों ने SC/ST के लिए बजट प्रावधान नहीं किया और क्यों?
6. आर्थिक विकास एवं रोजगार योजनाओं का वास्तविक लाभ कितने लोगों को मिला?
7. बजट में दर्ज राशि और वास्तविक लाभार्थियों के बीच क्या संबंध है?
8. क्या प्रत्येक योजना के परिणामों का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट किया गया?
9. क्या लाभार्थियों को योजना-वार जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई गई?
10. क्या SCSP/TSP के बजट को परिणाम आधारित बनाया गया?
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13. सुझाव
SCSP/TSP को अधिक प्रभावी बनाने के लिए निम्न कदम उठाए जा सकते हैं—
1. जनसंख्या आधारित स्पष्ट बजट
SC/ST की जनसंख्या के अनुपात में निर्धारित हिस्सेदारी को स्पष्ट रूप से बजट में प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
2. विभागवार पारदर्शिता
प्रत्येक विभाग में SC/ST के लिए निर्धारित राशि को अलग और स्पष्ट रूप से दर्शाया जाना चाहिए।
3. राशि का संरक्षण
SCSP/TSP की राशि को अन्य सामान्य योजनाओं में स्थानांतरित करने की संभावना को सीमित किया जाना चाहिए।
4. वास्तविक व्यय की निगरानी
सिर्फ आवंटन नहीं, बल्कि वास्तविक खर्च की नियमित समीक्षा होनी चाहिए।
5. सामाजिक ऑडिट
SC/ST संगठनों और नागरिक समाज की भागीदारी से सामाजिक ऑडिट की व्यवस्था की जानी चाहिए।
6. परिणाम आधारित बजट
कितना पैसा खर्च हुआ, इसके साथ यह भी बताया जाए कि उससे कितने स्कूल, रोजगार, उद्यम, आवास, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य लाभ उत्पन्न हुए।
7. सार्वजनिक सूचना
योजना-वार बजट, व्यय और लाभार्थियों की जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर सरल भाषा में उपलब्ध होनी चाहिए।
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निष्कर्ष
वित्तीय वर्ष 2017-18 के उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन यह संकेत देता है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए बजट आवंटन और उनकी जनसंख्या के अनुपात में अपेक्षित हिस्सेदारी के बीच महत्वपूर्ण अंतर था।
लेकिन SCSP/TSP का वास्तविक मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि बजट में कितनी राशि लिखी गई। सामाजिक न्याय की असली कसौटी यह है कि कितनी राशि वास्तव में लक्षित समुदाय तक पहुँची और उससे उनके जीवन में कितना परिवर्तन आया।
इसलिए SCSP/TSP की समीक्षा को चार चरणों में किया जाना चाहिए—
आवंटन → व्यय → परिणाम → लाभार्थी
यदि आवंटन पर्याप्त नहीं है तो संसाधनों का प्रश्न उठता है। यदि आवंटन पर्याप्त है लेकिन खर्च नहीं हुआ तो क्रियान्वयन का प्रश्न उठता है। यदि खर्च हुआ लेकिन परिणाम नहीं आया तो योजना की गुणवत्ता का प्रश्न उठता है। और यदि परिणाम आया लेकिन लक्षित समुदाय तक नहीं पहुँचा, तो जवाबदेही और सामाजिक न्याय का प्रश्न सामने आता है।
अतः अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के विकास के लिए बजट को केवल सरकारी लेखांकन का विषय न मानकर सामाजिक न्याय, आर्थिक अधिकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण उपकरण माना जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—
«“SC/ST के नाम पर बजट में कितनी राशि दिखाई गई?” से आगे बढ़कर हमें पूछना होगा— “उस राशि से SC/ST समुदाय के कितने परिवारों की जिंदगी बदली?”»
यही प्रश्न SCSP/TSP की वास्तविक सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना हो सकता है।
— निर्मल दास मानकर
दलित आर्थिक अधिकार आन्दोलन — मध्यप्रदेश
Nirmal Das Mankar
State Co-ordinator
DA-3, NCDHR
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