1जनवरी शौर्य दिवस भीमा कोरेगांव का युद्ध विजय स्तंभ गौरवशाली आत्मसम्मान का प्रतीक है।

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1जनवरी शौर्य दिवस भीमा कोरेगांव युद्ध विजय स्तंभ गौरवशाली आत्मसम्मान का प्रतीक है।

1जनवरी 1818 को पेशवा मराठा सैनिक और ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर महार रेजीमेंट के बीच युद्ध ऐतिहासिक है कि महार रेजीमेंट की जीत हुई थी।यह युद्ध घमंड जाति अत्याचार भेदभाव के लिए आत्म सम्मान के लिए हुआ था, भीमा कोरेगांव का युद्ध जाति भेदभाव उत्पीड़न के खिलाफ महासंग्राम प्रतीक है। पेशवाओं के 28000 सैनिको को महार समुदाय के 500 रेजीमेंटों ने युद्ध में धुल चटाई थी। बीआर अंबेडकर बाबा साहेब ब्राह्मणवादी पेशवाओं के द्वारा किये जाने वाले अन्याय अत्याचार पर महारो की जीत के रूप में देखते है।महारो के आत्मसम्मान की लड़ाई थी। कहां जाता है कि महार समुदाय के लोगों ने पेशवाओं से ब्रिटिशो से लड़ने के लिए सम्मान का अधिकार मांगा था पेशवाओं ने ठुकरा कर दुत्कार कर भगा दिया था। ब्रिटिशो ने आत्मसम्मान देने की शर्त मंजूर कर ली थी और महारो ने पेशवाओं के घमंड को चुर-चुर कर आत्मसम्मान के लिए ब्रिटिशो की तरफ से पेशवाओं से आर-पार का युद्ध किया था।कहा जाता है कि छत्रपति संभाजी महाराज की औरंगजेब ने बड़ी क्रुरता से हत्या कर दी थी, छत्रपति संभाजी महाराज के शरीर को काटकर नदी में फेंक दिया था और छत्रपति संभाजी महाराज की अंत्येष्टि करने वाले को सजा दिये जाने ऐलान किया था। और महार समाज के पहलवान गोविंद गायकवाड़ ने छत्रपति संभाजी महाराज का अंतिम संस्कार अंत्येष्टि की थी।छत्रपति शिवाजी के पोते शाहु ने ब्राह्मण भट्ट परिवार को पेशवा बनाकर सत्ता वंशानुगत कर दी थी जिससे कुछ वर्षों में पेशवाओं की शक्ति बढ़ने से पेशवा सैनिकों का विस्तार होकर साम्राज्य स्थापित हो गया न्यायिक सामाजिक व्यवस्था मनुस्मृति के धर्मशास्त्रो आधारित होने से पेशवाओं दलितों का सामाजिक बहिष्कार किया था दलितों पर छुआ-छूत भेदभाव उत्पीड़न गले में मटका कमर में झाड़ू लगाये जाने लगा

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