
इमारत शरिया पर जदयू नेताओं का हमला – सामाजिक और राजनीतिक हलकों में गुस्सा
इमारत शरिया पर जदयू नेताओं का हमला – सामाजिक राजनीतिक हलकों में गुस्सा
✍️ *_मोहम्मद उवैस रहमानी_* 98934768939893476893
पटना, 29 मार्च – बिहार, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल की प्रतिष्ठित इस्लामिक संस्था *इमारत शरिया* पर जदयू नेताओं और पुलिस बल द्वारा किए गए हमले ने समाज में आक्रोश की लहर दौड़ा दी है। इस हमले का नेतृत्व जदयू नेता *अहमद अशफाक करीम* ने किया, जिनके साथ मौलाना अनीसुर रहमान कासमी, मौलाना अबू तालिब रहमानी, मौलाना मुहम्मद शिबली अल कासमी, मौलाना जफर अब्दुर रऊफ रहमानी, मुफ्ती नजर तौहीद मजाहिरी, वकील रागिब अहसन, मंजूर आलम इटकी, डॉक्टर मजीद आलम राँची, महमूद आलम कोलकाता और रियाज़ शरीफ़ जमशेदपुर समेत कई अन्य जदयू समर्थक मौजूद थे।
यह शर्मनाक घटना *रमज़ान के पाक* महीने में उस समय अंजाम दी गई जब इमारत शरिया में अवकाश था। ऐसा प्रतीत होता है कि जदयू के नेताओं ने कार्यालय में कम उपस्थिति का फायदा उठाने के लिए इस हमले को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया।
*हमले के पीछे की मंशा?*
विशेषज्ञों के अनुसार, यह हमला *वक्फ़ संशोधन बिल* के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों का बदला लेने और इमारत शरिया को जबरन जदयू समर्थकों के अधीन करने की कोशिश थी। हालांकि, संस्था के जिम्मेदारों ने इस दबाव को दृढ़ता से नकार दिया।
*सामाजिक और राजनीतिक हलकों में विरोध*
इस हमले की निंदा पूरे देश में की जा रही है। *उलेमा-ए-किराम, सामाजिक संगठनों और सिविल सोसाइटी* ने इसे असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक हमला बताया है। कई राजनीतिक विशेषज्ञ इसे *मुस्लिम नेतृत्व को कमजोर करने की साजिश* करार दे रहे हैं।
*क्या कहती है इमारत शरिया?*
इमारत शरिया के पदाधिकारियों ने इस हमले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का संकेत दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्था किसी भी राजनीतिक दबाव में नहीं झुकेगी और अपने अधिकारों तथा स्वायत्तता की रक्षा के लिए संघर्ष करती रहेगी।
*भविष्य के परिणाम*
विश्लेषकों का मानना है कि जदयू की यह कार्रवाई मुस्लिम समुदाय में असंतोष और अविश्वास को और बढ़ाएगी, जिसका असर आगामी चुनावों पर भी पड़ सकता है।
देश में *लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता* की रक्षा के लिए इस हमले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग उठ रही है।